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फकीरों की यूनिवर्सिटी के काबा: गोपाल बाबा

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सूफी, संत, पीर, फकीर, साधु, सन्यासी, आदि-आदि! ये हम लोगों के बीच से ही कुछ आम संबोधन हैं जी! इन पर हमारी नजर टिक गई तो ठीक अन्यथा मान लेते हैं कि सामने से कोई मानवीय परछाई सि गुजर गई। लेकिन इनमें कई विभूतियां ऐसी भी हैं जिनकी परछाई भी हमारा ध्यान खींचने में कामयाब रही। इन्हीं विभूतियों में एक विभूति तीन दशक से हमारे सामने सचेष्ट चलती-फिरती रही! मगर गुमनाम सि। छरहरी काया, लम्बी दाड़ी, श्वेत केशी। ऊपर सफेद दुसाला, नीचे धोती वो भी सफेद ही। निराली छवी। कई बार बात करने की जिज्ञासा जागी किंतु क्या है कि जिज्ञासा भी संजोग की घड़ी नहीं ढूंढ पाई। हां! इतना जरूर है कि नाम उनका सदैव कंठस्थ सा रहा-गोपाल बाबा! यह भी कि मातृभूमि-पंजाब की धरती! किसी से सुना- विद्वान मनीषी! कोई ऐसे भी कहते सुना गया कि- इनके पेशे में कभी अंग्रेज़ी की अध्यापकी भी रही। बस उनके हिस्से की इतनी ही सामान्य सि जानकारी लगभग तीन दशक तक मेरे दिलो-दिमाग में जमी रही।

16/17 जून 2013…….केदार की भयानक त्रासदी। उसके बाद सदमे और सन्नाटे के दिन। उसी गमगीन माहौल में दिवंगत बी. मोहन जी ने आपदा पर कुछेक कोलाज बनाये और अवलोकन हेतु मुझे ‘जागृति फोटो स्टुडियो’ में बुलाया। संयोगवश ‘जागृति फोटो स्टुडियो’ में रखे एकमात्र बैंच के एक कोने पर गोपाल बाबा पहले से ही आसीन थे। किन्तु दो व्यक्तियों के बैठने लायक जगह तब भी प्रयाप्त थी। बैंच पर गोपाल जी से सटकर बैठते ही बी. मोहन भी मेरे बगलगीर हुये। बी. मोहन जी ने थैले से केदार आपदा पर बनाया एक कोलाज मुझे थमाया। हाथ में आते ही गम्भीरतापूर्वक कोलाज को देखने लगा। इसी बीच शायद बाबा गोपाल जी की दृष्टि मेरे हाथ पर रखे कोलाज पर टिकी और अनायास ही उनकी धीर गम्भीर आवाज में केदार आपदा पर कुछेक पंक्तियां सुनाई दी। पंक्तियां के शब्द थे –

यूं बाज परिन्दों पे झपटते नहीं देखे
यूं बाग चरिन्दों पर लिपटते नहीं देखे
केदार से गौरी तक लाशों का वो दरिया
ऐसे तो कभी बादल फटते नहीं देखे।

बी. मोहन जी और मैं दोनों चौंके। बाबा गोपाल जी को एकटक देखा। प्रणाम निवेदित करते-करते मेरे मुंह से ही स्वतः ही निकल पड़ा – ‘वाह क्या कविता है! एक-एक शब्द सुगठित नपा-तुला।’ बी. मोहन जी ने आगे जोडा- ‘न कम न ज्यादा वाह!

बाबा ने तुरन्त कहा – जनाब! ये कविता नहीं है ! रुबाई है! केदार आपदा पर ही एक और रुबाई सुनिए!

हर सांस महज बोझ है ढोने के लिए
बचा न ख्वाब कोइ दिल में संजोने के लिए
दम तोड़ने वाले तो मुसीबत से छुटे
जो बच गए वो रह गये, रोने के लिए।

बी. मोहन जी ने गोपाल जी से पंक्तियों को पुनः सुनाने को कहा और कागज पर एक-एक शब्द लिखते चले गये। यही शब्द बाद में बी. मोहन जी ने कविता पोस्टर में भी उकेरे। फिर तो बाबा गोपाल जी से मिलने-जुलने का सिलसिला चल पड़ा। जो आज तक जारी है। एक मर्तबा ख्यातिनाम गजलकार प्रेम साहिल जी भी आपसे मिलने पहुंचे। तब भी कई प्रतिभाओं से एक साथ मिलने का मौका मिला। आगे नित सम्पर्क से ही ज्ञात हुआ कि गोपाल बाबा अंग्रेजी, उर्दू, हिन्दी, पंजाबी के अध्येता ही नहीं अपितु उनके गम्भीर जानकार भी हैं। एक दिन कंकालेश्वर महादेव में उनसे कुछेक अनछुये पहलुओं पर चर्चा हुई।

पूछा- गोपाल जी! आप पंजाब से हैं। इस देवधाम में कैसे आना हुआ?

बोल पड़े- फकीराना स्वभाव बचपन से ही था। फकीरी जन्मजात होती है। इन्हीं बातों से हम पुनर्जन्म को मानते हैं। पहले जन्म से संस्कार बनते हैं। फिर हम उन संस्कारों को लेकर आते हैं। फिर उन संस्कारों का खेल चलता है। अग्रेंजी का स्टुडेंट रहा। पागलों की तरह पढ़ता रहा। पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में 15 वर्ष अंग्रेजी का अध्यापन किया। पर यूं समझ लीजिए घर में भी रहा तो फकीर ही रहा। मां समझ चुकी थी कि ये अब घर में टिकेगा नहीं। मेरी मां मर्दाना औरत थी। लेकिन मां में ममता भी तो थी। मां ने मुझसे कहा- यहीं कहीं आस-पास कुटिया बना ले। भीक्षा मांगने की भी जरूरत नहीं। खाना घर से बनाकर दे देंगे। किन्तु तब तक मेरे मन में फकीरी गहरे तक पैठ चुकी थी। सोचा जब खाना घर से ही लेना है तो फकीरी किस बात की? समय गुजरता रहा लेकिन फकीराना स्वभाव बदला नहीं। एक दिन स्वामी रामतीर्थ जी का लिखा कहीं पढ़ा- ‘हिमालय फकीरों की यूनिवर्सिटी है।’ हिमालय सारा। इसमें हिमांचल भी आ जाता है। बस फिर तो क्या था चल पड़ा सीधे बद्रीनाथ धाम के लिए। सन 1980 के आस-पास। एक साल आठ महिना लछमोळी शिवालय वाले बाबा ने रोक दिया। फिर गंगोत्री। गंगोत्री से देवप्रयाग पहुंचा। देवप्रयाग में पांच साल तक फिर अंग्रेज़ी का अध्यापन किया। और फिर फकीरी पौड़ी ले आई। लगभग पैंतीस साल से यहीं हूं। लेकिन देव्रपयाग आज भी मेरे घर जैसा है।

-आप साइराना स्वभाव के हैं। उर्दू वाला यहां आपके इर्द-गिर्द कोई है नहीं। फिर बांज बुरांस के इस घने जंगल के बीच आप…?

-मैं तो फकीरी करने निकला हूं जनाब! साइरी करने नहीं! (थोड़ा रूके और फिर रौ में बोल पड़े) सुनो! मेरे पास एक मोहमंडन आये। उनको किसी ने बताया था कि मैं साइरी करता हूं। आते ही कहने लगे- बाबा! आप ठहरे साइरी स्वभाव के, कहां पंजाब और कहां ये जंगल, बताओ आपका यहां क्या रखा है? क्यों रह रहे हैं आप यहां? मैंने कहा सुनिए जनाब! जब पंजाब से यहां पहुंचा तो न मुझे गढ़वाली आता थी न किसी से कोई वास्ता । तब मैंने एक रुबाई लिखी-

इस दिल में नई आस तो आ जाने दे
कोई अपना मेरे पास तो आ जाने दे
पंजाब भुलने में कोई देर नहीं
गढ़वाल मुझे रास तो आ जाने दे।

और जब घुलमिल गया तो फिर मैंने एक और रुबाई लिखी-

सौ झूठों का एक झूठ, गई जन्नत मुझसे
किसने ये कहा रूठ गई, जन्नत मुझसे
पंजाब के घी जैसा है गढ़वाल का पानी
यां मिल गई,वां छुट गई जन्नत मुझसे।

पंजाब भी जन्नत है। गढ़वाल भी जन्नत ही है। अब देखो यहां मैं रहता हूं। माहौल आप देख रहे हैं। एकदम शांत। यहां बैठना ही तप है। फकीरी का मतलब जितना कम उतना अच्छा। और फिर सबसि बड़ी चुप! इसी पर एक रुबाई सुनिए-

बस्ती न रही अपनी,न घर घाट रहे हैं
जंगल में मुकदर की फसल काट रहे हैं
सद रंग परिदों के उरकैफ तराने
सुन-सुन कर मेरे कान सैद चाट रहे हैं।

मैं एकान्त प्रिय हूं। बाकि फकीर भीड़ में भी अकेला ही होता है। गालिब का एक शेर है-‘बागीचा ये इतफाल है दुनिया मेरे आगे/होता है रोज तमाशा मेरे आगे।’
तिफल कहते हैं बच्चे को। इतफाल उसकी Plural है। इतफाल कहते है खेल को। गालिब कहते हैं ये दुनिया मेरे सामने बच्चों का खेल है।

-बहुत गहराई है रुबाईयों में। लेकिन रुबाई को हम समझे कैसे?

-1 लाइन को मिसरा कहते हैं। 2 लाइन शेर या गजल कहलाती है। 4 लाइन कता या रुबाई। रुबाई को रुबाई से ही जरा गहराई से समझाता हूं। पंक्तियां हैं-

गर्दिश में मुकदर का सितारा है तो क्या
दिल दर्द से लबरेज हमारा है तो क्या
हर कतरा है सबनम हंसी हैं मेरे आंसू
हर अश्क समन्दर से भी खारा है तो क्या
इस रुबाई में सितारा, हमारा, खारा -ये काफिया है। है तो क्या – ये रदीफ है। रदीफ बनी रहती है। काफिया बदलना पड़ता है। तीसरी लाईन का काफिया नहीं मिलता।

-पंजाबी में कोई रूबाई?

-पंजाबी में सुनिए-
गम नु अपनाया, गुजारा कर लिया
रोग रोज एक लाया, गुजारा कर लिया
हर खुशी सपना, सपना है फरेब
दिल नु समझाया, गुजारा कर लिया

-रूबाई कब से लिखनी शुरु की?

Poets are born. They are not made। पढ़ने से पोयद्री की समझ हो जाती है। लेकिन पोयद्री कहना जन्मजात होता है। सीखा नहीं जाता। आलोचक बन सकते हैं। आप आलोचना, समालोचना सीख सकते हैं। ऐसे ही फकीरी भी जन्मजात होती है।

-आपने अब तक कितनी रुबाइयां लिखीं?
-बहुत लिखी हैं! पत्र पत्रकाओं में छपी भी हैं। लेकिन मुझे समझाने वाले ने एक ही बात कही कि जिन्दगी में भले ही एक ही रुबाई कहना लेकिन वो रुबाई हो।

-वो कौन थे?

-मैं शिमला में भी रहा पांच साल। मेरा वास्ता वहां शहंसाहे रुबाया अख्तर रिजवानी जी से हुई। इंडो-पाक की अदबी दुनिया में उन्हें शहंसाहे रुबाया नाम से ही जाने जाता था। उन्होंने रुबाई ही लीखी। जुदा-जुदा जगत है। स्थूल जगत और शूक्ष्म जगत। वे शूक्ष्म जगत में रहते थे। उनका शरीर ही ढल गया था। उनकी पोजीशन मैंने ऐसी देखी कि कोई तलवार लेकर आये और उनकी टांग काट दे तो उनको पता भी न चले। उनके दर्शनों से ही लगता था कि आपने उन्हें सुन लिया। कई साल उनके साथ रहा। उन्होंने मुझे सार्गिद नहीं बेटा बनाया। ये संजोग की बात होती है। पुनर्जन्म के संजोग होते हैं तब मिलते हैं। इंडिया में उनके साथ कई मुसायिरे किये। बड़े-बड़े रंग देखे। वे गम के शायर थे। गम की तस्वीर थे। गमी कहते थे। गम क्या होता है? इसकी समझ नहीं लोगों को। लोग कहते हैं रोना-पीटना ही गम है। एक गम वो होता है जो दबाता है। गर्क करता है। आपकी फैकल्टी को छीन लेता है। और एक गम वो होता है जो उबारता है। ‘लगती है चोट कहीं ताजा दिल पर/दिल और जवां और जवां होता है।’ ये वो गम है।
उनकी दो रुबाईयां सुनिए! इनमें से एक इन्सान पर रुबाई है-

ऐसासै कसमकस में यूं ही पलता है
माहौल के सांचे में अभी ढलता है
ये दोस्त मुझे अजमते इंसा कि कसम
इंसा अभी घुटनों के बल चलता है।
Struggle.लगा है Struggle पर आदमी। इंसान की Greatness बहुत बड़ी है। आसमान में सितारों तक पहुंच रहा है।

दूसरी परमात्मा पर उनकी रुबाई है। ध्यान से सुनिये-

ये पैकरे ऐजाजेनुमा कैसा है
तस्वीर कसै अर्जोसुमा कैसा है
तस्लीम कि मौजू है हर जरे पे
इस पर भी हैरत है खुदा कैसा है।

पैकरे कहते हैं जिस्म को। ब्रहमाण्ड परमात्मा का जिस्म है। ऐजानेनुमा (Wonderful)। हमारे शास्त्र भी कहते हैं कि जिस्म परमात्मा है। अर्ज कहते हैं जमीं को। समां आसमान। परमात्मा एक मिस्ट्री है। कहते हैं आसमान परमात्मा का पेट, सूर्य आंर चांद उसकी आंखें हैं। इस संसार में परमात्मा से हमको प्यार क्यों नहीं होता ?क्योंकि वी डोंट वंडर विद हिज क्रियेसन। गालिब का एक शेर है- ‘ कुछ न था तो खुदा था/ कुछ न होता तो खुदा होता/ढुबोया मुझको होने ने/न मैं होता तो क्या होता। ’ क्या होता? खुदा होता। इसलिए उसके वंडर पर हैरानी होनी चाहिए। जब आप हैरानी बनाकर रखते हैं तब कृपा होती है। हमारी Sense Of Wonder जब डिक्लाइन करती है तो हमारा पतन होता है। रोमांटिक पोयट्री का एक फीचर वंडर ही है। आदमी जब बैठता है तब इन बातों की समझ आती है।

परमात्मा पर मेरी भी एक रूबाई सुनिये-

लफ्जों के थपेड़े हैं, मारा मारी है
अब हम क्या कहें, कौन किस पे भारी है?
इस दुनिया में फानी का खुदा है या नहीं
यह बहस कदीमी (शुरू से) है, मगर जारी है।

-अख्तर रिजवानी जी के अलावा और किस साइर को पढ़ा?

-पढ़ने-पढ़ाने के अलावा और किया ही क्या? पढ़ा, समझा और छूटता रहा। इस सन्दर्भ में स्वामी विवेकानंद से प्रभावित रहा। विवेकानंद से किसी ने पूछा- ‘वेद क्यो पढ़े जाते हैं? उन्होने जबाब दिया-‘ताकि वेद छूट जायें।’ इसी प्रकार पढ़ा क्यों जाता है? ताकि समझ आ जाय। समझ आ गई तो छूट गई। बहुतेरा पढ़ा। यहां भी आप देख रहे हैं जो पढ़ा है वो पड़ा है। स्वामी अरविन्द के साहित्य को मैं पांडिचेरी से लाया। सच कहूं तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी श्रद्धानंद तथा स्वामी अरविंद ने ही मुझे फकीर बनाया।

-फकीर और देवालय का अटूट संबन्ध रहा है। आप शिवालय के समीप हैं। शिवालय में जाकर माथा नवाते हैं या नहीं?

-मैं किसी मंदिर में नहीं जाता। शिकायत भी किसी से नहीं। हम फकीर हैं।

वहीं काबा सरक आया/जमीं हमनें जहां रख दी
हमारी चीज थी/हमनें जहां चाही रख दी।
फिर बहते हुये पानी पर/बुनयादे मकां रख दी।

-पंजाबी , अंगेज़ी, हिन्दी के साथ-साथ उर्दू पर भी आपका समान अधिकार रहा है।

-हां! उर्दू से भी बड़ा प्यार रहा है।

-उर्दू साहित्य की कोई किताब जिससे आप प्रभावित रहे?

-ख्वाजा दिल मोहम्मद की ‘दिल की गीता’। असली गीता पढ़ने में वो आनन्द नहीं आता जो उसको पढ़ने में आता है। ‘दिल की गीता’ मुझे सारी याद है। ख्वाजा दिल मोहम्मद इस्लामिया कालेज, लाहोर में प्रिसीपल थे। वो कई साल बनारस में रहे। उपनिषद पढ़े। सारी गीता को समझा तब जाकर उर्दू में ‘दिल की गीता’ को लिखा। अब तो वह हिन्दी में भी छप गई है।

-पंजाबी, अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू पर आपका समान अधिकार कैसी लगती है आस-पास की साहित्यिक जमीन?

-गढ़वाली पोयट्री में जानता नहीं। उर्दू वाला में जानता नहीं। हिन्दी वाला कोई नजर आता नहीं।

वक्त सरकते-सरकते बात एक तस्वीर खींचवाने के अर्ज तक पहुंची। थोड़ा ठठाकर हंसे। फिर हंसते- हंसते ही गम्भीर होते हुये बोले- सुनो! जब घर से चला था तो मेरे घर में मेरी कोई तस्वीर नहीं थी। बाद में बद्रीनाथ में तप्तकुण्ड के पास के किसी फकीर ने मुझे पहचान लिया। उसने बताया कि मेरे घर छोड़ने के विद इन सिक्स मंथ माई फादर डाइड। एण्ड विद इन नाइन मंथ माई मदर डाइड। पंजाबी में एक कहावत है कि ‘मां एक ऐसी बूटा है कि जब उसका फूल मर जाता है तो वह भी मर जाता है।’ लेकिन आज तक मेरे सपने में न मेरी मां आई न मेरे पिता। न मेरी बहन न मेरा भाई। इसलिए मैं मानता हूं कि मेरा घर छोड़ने का जो फैसला था वह सही था। वैसे भी जब उनके पास मेरी कोई तस्वीर ही नहीं थी तो आगे क्या ढूंढ खबर होती। (थोड़ा दार्शनिक भाव से) मैं तस्वीर उस्वीर नहीं मानता। तस्वीर खिंचवाने के बाद वह एका कहां रह जाती है। इसी पर किसी सायर ने एक अच्छी रुबाई लिखी। उसे भी सुनिए-

एक से जब दो हुये
तो लुफ्ते एकताई ही नहीं
(अर्थात जब आप अकेले थे तो आप थे। तस्वीर खींची तो दो हुये। और जब दो हुये तो आप एक रहे ही नहीं।)
इसीलिए तस्वीरें जानां
हमनें खिंचवाई ही नहीं।

इतना कहते हुये खिल खिलाकर हंस पड़े। हंसना रोका और स्वतः ही बुबबुदाये- दुनिया से जुदा गाना है तकदीर का रंग!

मौका देख एक और सवाल दागा- बाबा! यदि आपको कोई मुसायरे में बुलाये तो क्या आप जायेंगे ?

-ओय! ओय! क्यों नहीं? ढ़ंग का कोई हो। अदमी मसल हो वहां जाया जा सकता है।
सुनकर लगा आज भी उनके उत्साह में कोई कमी नहीं। संध्या ढल चुकी थी। गोपाल जी से इजाजत चाही। दूसरे दिन कि ऐसी ही हलचल तक यह इजाजत मिल भी गई। गंतव्य तक बढ़ते-बढ़ते सोचा अगर पहाड़ में रुबाइ लिखी जा सकती है तो समझने की क्षमता क्यां नहीं पैदा की जा सकती? बडे तामझाम में न सही, एक-दो तो उन्हें सुनें, समझे। ताकि फकीरों की यूनिवर्सिटी के काबा: गोपाल बाबा जी की विद्वता भी यूं सुप्त न पड़ी रहे। और पहाड़ की कन्दराओं से भी रुबाई के अनछुये पहलुओं पर और, और, और प्रकाश पड़े।

आलेख – नरेंद्र कठैत – उत्तराखंड ।

सौजन्य – शैलेंद्र जोशी ।


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