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लोक में पप्पू का स्ट्रगल ही स्वर बनता है – ऐजा रे चैत बैसाखा मेरो मुन्स्यारा- अलविदा पप्पू कार्की !

‘पाना है मुकाम वो मुकाम अभी बाकी है, अभी तो जमीन पर आए हैं आसमान की उड़ान बाकी है’ अपनी फेसबुक वॉल पर यह स्टेटस डालते समय पप्पू कार्की ने नहीं सोचा होगा कि वह अपने सपने को अधूरा छोड़कर चले जाएंगे।

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अपने लोक के शब्द भाषा संगीत में सुर खोजने सजाने गाने लिखने वाले सभी वो कलावंत जिनको हमारा समाज लोक कलाकार , लोकगायक , गढ़ गौरव , कुमाऊ गौरव , उत्तराखंड की शान , हिमालय पुत्र , जागर सम्राट सुर सम्राट लोक सम्राट , उत्तराखंड गौरव न जाने प्रेम और सम्मान में क्या क्या नाम कभी समाज तो कभी सरकार देती है पर सुख में इनकी ताल नाच और कण्ठ से निकले लोक दर्शन में तो हम अपने कलावन्तों के दर्शन करते रहते है पर जब जब लोक कला साहित्य सँस्कृति से जुड़े संस्कृति कर्मियों में दुःख विपदा का पहाड़ टूटता है तो तब पता चलता ये कण्ठ अपनी साधना में तो तर है इनके पेट से भूखे है.

इनकी आर्थिक स्थिति ठीक नही कुछ एक आत उत्तराखंड कलावन्तों को छोड़ दिया जाए तो उत्तराखंड में कला साहित्य सँस्कृति जुड़े लोग आर्थिक रूप से कमजोर ही रहे ये तो उन लोगों की साधना ही है वो कम संसाधन में भी अपने साज सजा रहे है लोक गायन कर रहे लोक नृत्य कर रहे लोक साहित्य को पढ़ रहे लिख रहे लोक के दर्शन मंच में करा रहे और ऐसे आर्थिक स्थिति से लड़ते हुए लोक साहित्य सँस्कृति के इस आंदोलन में कही बार सफर में कही लोक आन्दोलनकारी शहीद भी हो जाते है जो अपनी भाषा शब्द संगीत लोक के लिए काम करते है कही कलावंतों के आय का साधन भी यही है और उत्तराखंड के गीत साहित्य संगीत के मंच इतने सशक्त नही है की वो कलावंत कम से कम प्रोग्राम करे या एक दिन में एक ही कार्यक्रम करे और वैसे भी उत्तराखंड के सांस्कृतिक कार्यक्रम सिजनली होते ऐसे में कही बार कलावंत एक ही दो या तीन सांस्कृतिक कार्यक्रम कर लेते है और ज्यदातर कार्यक्रम पहाड़ में होते है दिन रात केpappu karki प्रोग्रामो कही बार भागा दौड़ी में वही होता जो 9 जून 2018 को हुआ जिसमें उत्तराखंड के युवा स्टार गायक पप्पू कार्की अपने एक सांस्कृतिक प्रोग्राम में लौटते वक्त इस सांस्कृतिक लोक आन्दोलन में शहीद हो जाते अपने साथी कलाकारों के साथ इस तरह के कलावन्तों के जीवन मे आयी विपदा में उनके परिवारों के लिए क्या किया जा सकता सरकार या कोई भी ऐसी संस्था नही है जिनके पास कुछ ठोस नीति हो । वैसे हमारा समाज संस्था स्कूल कॉलेज कुछ भी भी बनाये लोक संस्कृतिकर्मी या पप्पू कार्की की तो नही बनाता कुमाऊ की सुदूर पहाड़ियों में पांच साल का पप्पू कब एक कान में हाथ रख न्यौली गाने लगता कभी रामलीलाओं और स्कूल में गाते वो सबका प्यारा पप्पू बन जाता है हिमालय कन्दराओं में जहाँ लोक में गीत संगीत तो है पर कोई सिखाने वाला नही बिना संगीत के महौल में पप्पू अपने स्कूल के मास्साब (गुरु जी) को देखते देखते उनसे थोड़ा बहुत सिख गाने लगता है पप्पू के मास्साब उसको 1998 में उसको दो गीत गवाते रामा कम्पनी से कैसेट निकाल कर जिसमे पप्पू के मास्साब के गीत भी है !

 

पप्पू के पिता जी गाँव मे किसान है पप्पू जैसे तैसे हाइस्कूल तक रैगुलर पढ़ता अपनी परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते वो निकल पढ़ता दिल्ली की तरफ जहां वो फैक्ट्री में कभी होटल में वेटरी काम कर अपना संगीत का शौक परिवार और पढ़ाई सबकों आगे बढ़ाता रहता कही दर्जनों गीत गाने और एक दशक तक स्ट्रगल करते करते पप्पू के गीत लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगते है हिट होते होते केसेट सीडी का दौर समाप्त होता यु ट्यूब का दौर आता जहां पप्पू के गीत यु ट्यूब से लेकर फेसबुक और वाट्सअप में वायरल होने लगते है पप्पू जहाँ पुराने लोकगीत और न्यौली लोगों आकर्षित कर रहा था वही पप्पू के नवीन प्रयोग से सजे स्वरचित गीत युवाओं में लोकप्रिय हो रहे थे शादी ब्याह हो या स्कूल कालेज का फंक्शन सब जगह पप्पू के ही गीत पप्पू की लोकप्रियता उसको देश विदेशों तक ले गयी , पप्पू ने अपनी मेहनत से हल्द्वानी में पीके प्रॉडक्शन कर एक ऑडिओ रिकॉर्डिंग स्टुडियो भी कि खोल लिया था जो काफी लोकप्रिय हो रहा था साथ ही वो वीडियो प्रोड्सक्शन और फिल्माकंन में भी गीतों मे अच्छा काम कर रहा था,

 

पप्पू कार्की लोक के मूल और प्राचीन गीतों को भी गा रहा था साथ ही नित नवीन प्रयोग भी कर रहा था अभी हाल में मई महीने में नेपाल देश जाकर पप्पू ने नेपाली कलाकारों के साथ मिलकर एक गीत रिकॉर्ड किया यह एक नवीन प्रयोग था जिसमें नेपाली संगीत में कोई कुमाऊनी गीत , पप्पू उत्तराखंड गीत संगीत में ऊर्जा के साथ बेहतरीन काम कर रहा था !

pappu karki

लोक के जानकर पप्पू में गोपाल बाबू गोस्वामी को खोज रहे थे पप्पू के पिता जी का भी निधन पिछले साल हुआ पप्पू अपने साधना से गीत संगीत और परिवार को मजबूत कर रहा था उसके परिवार में जहां पप्पू की माँ और पत्नी है और छोटा चार या पांच साल मासूम लड़का है , पप्पू कार्की जो एक लंम्बे संघर्ष के बाद अपने परिवार को मजबूती दे रहा था साथ ही उत्तराखंड के गीत संगीत साहित्य में अभिनव प्रयोग करते करते इस लोक आन्दोलन में शहीद हो जाता अपने साथी कलावन्तों के साथ पप्पू कार्की और उन कलावंतों के किए गए कार्यो को एक आर्थिक समाजिक सम्मान मिले इसके लिए कितनी सरकारें या ऐसी कौन सी संस्था या विभाग जो लोक के सृजनकार रचनाकारों की जीवन में आयी आपदा पर कुछ करने की कुछ ठोस नीति हो तभी आने वाले वक्त नये नये पप्पू कार्की पैदा हो पाएंगे बिना आर्थिक मजबूती के कला साहित्य सँस्कृति में कोई कलावंत आ पायेगा या लोक मे पप्पू स्ट्रगल में ही स्वर संगीत भाषा साहित्य में गाता रहेगा ?

 


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