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जानें कैसे अटल जी के एक फ़ैसले से रातोरात मुख्यमंत्री बने थे मोदी

विपक्ष पर भी छोड़ी गहरी छाप

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी कमी हर किसी को खल रही है। भाजपा की सत्ता को शून्य से शिखर तक ले जानें में इनका बहुत बड़ा योगदान है। इन्होंने दिन-रात एक करके भाजपा की छवि बनायी है। वाजपेयी जी ने नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार की है। इन्ही की देन है कि आज भाजपा केंद्र के साथ-साथ 20 से ज़्यादा राज्यों में अपना झंडा ऊँचा किए हुए है। नरेंद्र मोदी के बारे में किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। इस समय नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री पद सम्भालने के बाद इन्होंने अपने सभी भाषणों में अटल बिहारी के योगदान को याद किया है।

 

विपक्ष पर भी छोड़ी गहरी छाप:

atal bihari vajpayee

आपको बता दें कि इन दोनो नेताओं का बहुत गहरा रिश्ता रहा है। काफ़ी समय से एक-दूसरे को जानते थे। बहुत कम लोग ही यह बात जानते हैं कि अटल बिहारी बाजपेयी ही हैं, जिनके एक फ़ैसले की वजह से नरेंद्र मोदी रातोरात मुख्यमंत्री बन गए थे। आज सत्ता के शिखर तक का रास्ता मोदी ने इन्ही की वजह से तय किया है। इसमें अटल जी का बहुत बड़ा योगदान है। अटल बिहारी बाजपेयी की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। ये एक बेहतरीन व्यक्ति के साथ ही ज़बरदस्त नेता भी थे। विपक्ष पर भी इन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी।

 

2001 के भूकम्प ने हिलाकर रख दिया गुजरात को:

atal bihari vajpayee

गुजरात में 1995 के चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी। शंकर सिंह वाघेला और नरेंद्र मोदी को दरकीनार करके केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद पार्टी का काम-काज देखने के लिए नरेंद्र मोदी को दिल्ली बुला लिया गया। 1998 में गुजरात में मध्यावधि चुनाव हुए और एक बार फिर से भाजपा सत्ता में आयी। इसके बाद भी भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने नरेंद्र मोदी को दिल्ली से ही जोड़े रखा और केशुभाई पटेल को पुनः मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद आया प्रकृति का भयानक क़हर, 26 जनवरी 2001 को गणतंत्र दिवस के दिन भयानक भूकम्प ने पूरे गुजरात को हिलाकर रख दिया।

 

केशुभाई पटेल को देना पड़ा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा:

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प्रकृति के इस क़हर से बहुत बड़ा नुक़सान हुआ। उस समय की गुजरात सरकार भूकम्प की वजह से हुए नुक़सान के बाद हालत सम्भालने में नाकाम हुई। लोगों का सरकार के प्रति ग़ुस्सा फूट पड़ा। जिसका फल 2001 में हुए विधानसभा उपचुनाव में देखने को मिला। उस समय पार्टी की राज्य इकाई में केशुभाई पटेल के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर फूटने लगे थे। उपचुनाव में मिली हार ने भी केशुभाई पटेल के ख़िलाफ़ माहौल बना दिया। इसके बाद समय की नज़ाकत को देखते हुए ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए केशुभाई पटेल ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया।

 

लगातार चार बार रहे गुजरात के मुख्यमंत्री:

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मीडिया रिपोर्ट्स पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी दिल्ली में एक अंतिम संस्कार के लिए गए हुए थे। उसी समय उनके पास प्रधानमंत्री आवास से एक फ़ोन आया, जिसने नरेंद्र मोदी का पूरा जीवन ही बदल दिया। फ़ोन पर उनसे पीएमओ आकर मिलने के लिए कहा गया। उस समय केंद्र में एनडीए की सरकार थी और प्रधानमंत्री के पद पर अटल बिहारी वाजपेयी जी थे। उस दिन मुलाक़ात के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात चले गए मुख्यमंत्री का कार्यभार सम्भालने के लिए। इसके बाद वह लगातार 2002, 2007 और 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। 2014 में इन्होंने केंद्र की तरफ़ रूख किया और भारी बहुमत से जीत हासिल करके देश के प्रधानमंत्री का पद सम्भाला।

 

पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के लिए किया था बहुत काम:

आज भले ही अटल बिहारी वाजपेयी हमारे बीच में नहीं है, लेकिन इनके योगदान को भारतीय राजनीति में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। देश को मुश्किल हालात से निकालने में भी अटल जी का बड़ा योगदान रहा है। भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधारने के लिए उस समय इन्होंने बहुत प्रयास भी किया था। इनका प्रयास सफल भी हुआ था, लेकिन अचानक से पाकिस्तान के एक ग़लत निर्णय ने सबकुछ बदल दिया। इसके बाद कारगिल युद्ध में जीत हासिल करके भारत ने पाकिस्तान को सबक़ भी सिखाया। भारत को परमाणु सम्पन्न देश बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी का महत्वपूर्ण योगदान है। इनके बेहतरीन कामों की वजह से ही 2014 में मोदी सरकार ने इन्हें भारत रत्न से भी नवाज़ा था।

 


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