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बत्ती गुल मीटर चालू : अच्छे सब्जेक्ट पर कमजोर कहानी

फर्स्ट हाफ तीनों की दोस्ती और लव ट्रायंगल में वेस्ट किया गया है

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बॉलीवुड में इन दिनों सोशल मुद्दों पर बनी फिल्मों का दौर चल रहा है. ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ के बाद डायरेक्टर श्री नारायण सिंह ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ लेकर आये हैं. टॉयलेट एक प्रेम कथा की तरह ये फिल्म भी एक सोशल इश्यू पर बनी है.

फिल्म की कहानी उत्तराखंड में गढ़वाल परिपेक्ष की है. कहानी तीन दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, एसके (शाहिद कपूर), त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) और नोटी (श्रद्धा कपूर). एसके पेशे से वकील है और ब्लैकमेलिंग करके पैसे कमाता है. नोटी एक फैशन डिज़ाइनर है और त्रिपाठी एक फ़ैक्ट्री चलाता है. एसके और त्रिपाठी, नोटी को चाहते हैं. तीनों अपनी लाइफ में खुश हैं लेकिन इलेक्ट्रिसिटी कट का एक मुद्दा तीनों की लाइफ बदल देता है. त्रिपाठी अपने नए बिज़नेस से खुश है, लेकिन एक दिन उसे बिजली विभाग, इलेक्ट्रिसिटी का काफी महंगा बिल भेज देता हैं. त्रिपाठी इस सिचुएशन को हैंडल नहीं कर पाता है और सुसाइड कर लेता है. एसके इस बात का बदला लेने और अपने दोस्त को न्याय दिलाने के लिए केस को कोर्ट तक लेके जाता है.

मुख्य टॉपिक से भटक गयी फ़िल्म:

फिल्म में फर्स्ट हाफ तीनों की दोस्ती और लव ट्रायंगल में वेस्ट किया गया है. सेकंड हाफ में फिल्म की कहानी को टर्न दिया गया है. फिल्म की कहानी एक उम्दा सब्जेक्ट पर बनी है, लेकिन कहानी को फ़िल्मी पर्दे पर दिखाने में श्री नारायण सिंह कामयाब नहीं हो पाए. टॉयलेट एक प्रेम कथा के बाद सभी को उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें थी. 3 घंटे की फिल्म में मेन टॉपिक छूटता हुआ नजर आता है. फिल्म में लव ट्रायंगल को बेवजह लम्बा खींचा गया है. कहानी को फनी भी बनाने की कोशिश करी है, लेकिन चीप डायलॉग्स और एक्टर्स की कमजोर कॉमिक टाइमिंग दोनों ही फिल्म को कमजोर बनाते हैं.

फिल्म में एक नए परिवेश को लेना सराहनीय है लेकिन कमज़ोर रिसर्च और एक्टर्स का भाषा पर पकड़ न हो पाने की वजह से फिल्म मजाक का हिस्सा बन चुकी है.


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