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अटल बिहारी वाजपेयी की 6 प्रसिद्ध कविताएँ जो कर देंगी आपको ख़ुश

कविताओं ने किया निराशा में आशा की किरण का काम

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं रहे। स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद यानी 16 अगस्त की संध्या को उन्होंने अपने जीवन की आख़िरी साँस ली। हालाँकि अब वो हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन वो हमेशा अपने काम और कविताओं की वजह से अमर हो गए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु पर ना केवल भाजपा और उनके चाहने वालों ने आँसू बहाया बल्कि विपक्ष के लोगों को भी उनके जानें का गहरा दुःख है। अटल बिहारी वाजपेयी एक बेहतरीन राजनेता, प्रखर वक़्ता, और कलम में जादूगर थे। उन्होंने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक कविताएँ लिखी हैं।

 

कविताओं के ज़रिए भरा सैनिकों में जोश:

atal bihari vajpayee

भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों में कविताओं का ख़ूब इस्तेमाल करते थे। जब वो मंच पर बोलते थे तो उनको सुनने के लिए भारी संख्या में लोग एकत्र होते थे। जनता ने जितना प्यार और सम्मान उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर दिया, उतना ही प्यार और सम्मान उनकी कविताओं को भी मिला। जब कारगिल का युद्ध हो रहा था, उस समय भी अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी कविताओं के ज़रिए सैनिकों के हौसले को बुलंद किया था। जो लोग अटल बिहारी को क़रीब से जानते थे, उन्हें पता है कि उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

 

कविताओं ने किया निराशा में आशा की किरण का काम:

अटल जी की कविताएँ केवल कुछ पंक्तियाँ नहीं बल्कि जीवन का एक नज़रिया भी है। समाज के हर रूप को उनकी कविताओं में देखा जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं में समाज के ताने-बाने के साथ आगे चलने की प्रेरणा मिलती है। वहीं घोर निराशा में आशा की किरण भरने का काम भी उनकी कविताओं ने किया है। आज भले ही अटल जी हमारे बीच नहीं है, लेकिन उन्हें यह दुनिया कभी भुला नहीं पाएगी। अटल थे, अटल हैं और अटल हमेशा रहेंगे। इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से ख़ुद को इतिहास में अमर कर दिया है। आज हम आपको अटल बिहारी वाजपेयी की 6 ऐसी कविताओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके सोचने के नज़रिए को हमेशा के लिए बदल देगी।

 

अटल बिहारी वाजपेयी की प्रमुख कविताएँ:

मौत से ठन गई:

atal bihari vajpayee

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई!


क़दम मिलाकर चलना होगा:

atal bihari vajpayee

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।।

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।।


कौरव कौन, पांडव कौन:

atal bihari vajpayee

कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है।
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है।
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है।
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है।


सूर्य तो फिर भी उगेगा:

atal bihari vajpayee

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं।
ऐसी खुशियां
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं।

क्कांयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूं
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बूंदों को ढूंढूं?
सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊं?
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊं?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी।


ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया:

atal bihari vajpayee

भेद में अभेद खो गया।
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।।

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।।

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।।


क्षमा करो बापू तुम हमको:

atal bihari vajpayee

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

अटल बिहारी वाजपेयी अपनी इन कविताओं के ज़रिए अपने चाहने वालों के दिलों में हमेशा के लिए अमर रहेंगे। इनकी कविताओं में जीवन दर्शन साफ़-साफ़ झलकता है। हालाँकि इसको आम आदमी समझ नहीं पाएगा, लेकिन जो साहित्य का प्रेमी होगा वो कविताओं की गहराई को समझ सकता है। अटल जी की इन्ही कविताओं के साथ हम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली देते हैं। वह जहाँ भी रहे ऐसे ही अपनी मुस्कान से सबका दिल जीतते रहें और अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहें।

 


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