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अपहरण के सबसे ज़्यादा मामले भाजपा नेताओं के ख़िलाफ़, कहीं नया धंधा तो नहीं शुरू कर लिया

पिछले कुछ सालों में बढ़ गया है अपराध का स्तर

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नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में मई महीने में भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण किया था तब उन्होंने अपना 56 इंच का सीना तानकर कहा था कि ना खाऊँगा और ना ही खाने दूँग। आज देश की स्थिति क्या है, यह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। आज भ्रष्टाचार के सबसे ज़्यादा मामलों में भाजपा नेताओं या उनके क़रीबियों के नाम शामिल हैं। मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने वाला है और देश में अबतक कोई नया बदलाव नहीं आया है। मोदी सरकार ने ना ही कोई ऐसा नया काम किया, जिससे जनता को कोई फ़ायदा हो। उलटा जनता की परेशानियों को और बढ़ाने का काम किया।

 

ना ही काला धन आया और ना ही रुका जाली नोटों का कारोबार:

आपको नोटबंदी का वो दर्दनाक समय तो याद ही होगा, जब नरेंद्र मोदी ने रात के समय अचानक से नोटबंदी की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा था कि देश में काले धन की समस्या ज़्यादा बढ़ गयी है और इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह कठिन फ़ैसला किया है। नोटबंदी के बाद जनता को जो परेशनियाँ हुई थी, उससे आप लोग अच्छी तरह से परिचित होंगे। ठंड के समय में लोग रात-रात भर जागकर एटीएम की लाइन में लगकर पैसे निकालने के लिए मजबूर हो गए थे। नोटबंदी से ना ही काला धन वापस आया और ना ही जाली नोटों का कारोबार रुका।

 

मोदी सरकार ने किया है भोली-भाली जनता को छलने का प्रयास:

नोटबंदी के बाद सबसे ज़्यादा नोट भाजपा नेताओं और उनके रिश्तेदारों के पकड़े गए थे। हालाँकि नरेंद्र मोदी ने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया। पिछले साल रिज़र्व बैंक ने यह ख़ुलासा किया कि बैंक में लगभग 99 प्रतिशत पुराने नोट वापस आ गए हैं। रिज़र्व बैंक की उस रिपोर्ट के हिसाब से देखा जाए तो देश के अंदर कोई काला धन था ही नहीं। इसका मतलब नरेंद्र मोदी ने देश की भोली-भाली जनता को छलने का काम किया था। मोदी सरकार हमेशा एक और दावे करती रही है कि वह देश से अपराध को भी ख़त्म कर देगी। लेकिन देश में अपराध का स्तर पिछले कुछ सालों में बहुत ज़्यादा बढ़ गया है।

 

सबसे ज़्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं भाजपा सदस्यों के ऊपर:

हाल ही में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के ऊपर अपहरण के मामले दर्ज हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह भारत की किसी भी राजनीतिक पार्टी से कहीं ज़्यादा है। देश के 4867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाख़िल किए गए हलफ़नामे के विश्लेषण से यह ख़ुलासा हुआ है। चुनाव और राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक ग़ैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म्स ने सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया है।

 

हलफ़नामे से हुआ इस बात का ख़ुलासा:

इसके अनुसार 770 सांसदों और 4086 विधायकों के हलफ़नामे से इस बात का ख़ुलासा हुआ है कि 1024 या लगभग 21 प्रतिशत देश के सांसदों और विधायकों ने यह स्वीकार किया है कि उनके ख़िलाफ़ गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमे से 64 से अपने ख़िलाफ़ अपहरण सम्बंधित मामलों में संलिप्त होने की भी घोषणा की है। आपको जानकर हैरानी होगी कि अपराधियों की इस सूची में भाजपा सबसे आगे है। जबकि कांग्रेस और जनता दल दोनो ही दूसरे स्थान पर हैं। दोनो ही पार्टियों के छः-छः विधायक-संसद इस सूची में शामिल हैं।

 

उत्तर प्रदेश और बिहार के सबसे ज़्यादा सदस्य हैं लिस्ट में शामिल:

एडीआर के अनुसार सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस के पाँच सदस्य, बीजू जनता दल और द्रमुक के चार-चार सदस्य, सपा और तेदेपा के तीन-तीन सदस्य, तृणमूल कांग्रेस, माकपा और शिवसेना के दो-दो सदस्य भी शामिल हैं। इस सूची में लोजपा, जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य शामिल हैं। अपहरण सम्बंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार और उत्तर प्रदेश के नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पक्षिम बंगाल के छह, ओडिशा और तमिलनाडु के चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के तीन-तीन, छत्तीसगढ़, हिमांचल, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब और तेलंगाना के एक-एक सदस्य शामिल हैं।


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