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बालश्रम कानून की धज्जिया उड़ रही हैं, पेट के लिए काम कर रहे हैं नौनिहाल

नहीं मिल रहा सामाजिक संगठनों का सहयोग! कचरों में खेलती इनकी जिन्दगीं |

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   सरकार द्वारा बनाया गया बाल श्रम प्रतिरोध एवं विनियमन कानून देश में बेअसर साबित हो रहा है। शहरों से लेकर, कस्बो, चौराहों व ईट- भट्टों पर बाल श्रमिकों का शोषण जारी है। यहां तक कि देश की सबसे बङी महत्वकांक्षी योजना मनरेगा( महात्मां गांधी रोजगार गांरंटी योजना) में काम करते हुए दिखाई दे जायेंगे। ये हर जगह आपको छोटू नाम से होटलों, किराना व चाय की दूकानों में काम करने वाले इन बच्चों के सपनें पथरा गये है या फिर साफ शब्दों में कहे तो ये सपने ही देखना भूल गये है। इन्हें दो वक्त की रोटी व पैसों का लालच देकर इनसे हाङ-तोङ मेहनत करने को मजबूर कर दिया जाता है। मजदूरी के नाम पर बच्चों को एक से तीन हजार रुपये दिया जाते है। इन्हें सबसे ज्यादां होटलों में झूठे बर्तन माजने व साफ- सफाई, झाडू- पोछा सहित अन्य काम करने पङते है, सूरज उगने से पहले और देर रात तक इनसे काम कराया जाता है। जिससें ये पूरी नींद भी नहीं सो पाते और इनका शरीर कमजोर पङ जाता है। सरकार ने बाल श्रम कानून में संशोधन करते हुए कपङे एवं किरानें की दुकानों को छोङकर अन्य कार्यों के लिए खतरनाक माना था। देश में बाल श्रम उन्मूलन समिति तो बनी है पर इसे रोक पाने में असमर्थ साबित हो रही है  किसी भी चाय व रेस्टोरेन्ट व होटलों में बाल श्रम कानून तार- तार होता दिखाई दे रहा है। मुझे लगता कि हम कहीं भी जायें ये छोटू चाय लाना, थोङी पानी लाना, थोङा टेबल साफ कर देना ये  दिन में एक बार जरुर ही कहते होंगे। हर चौक- चौराहों पर स्थित होटलों, फुटपाथ दुकानों में हीं नहीं अंङा, फल, मुंगफली आदि बेचते है। यहां जीन के लिए जूता पालिश भी करते है। गांवों में बकरी व भैंस चराते बच्चे हर मोङ पर दिख जाते है।

 इतना ही नहीं ईट- भट्टों पर यह सिलसिला और भी बदस्तुर जारी है। कङी धूप में मैले- कूचले कपङों में ये बच्चों की असली हकिकत को आप कहीं न कहीं जरुर देखते है।

                        यहां सर्व शिक्षा अभियान के सारे दावे की हवा निकलती दिख रही है। इस अभियान के तहत लोगों को जागरुक करने वाली सरकारी जुमले भी बेमानी साबित हो रहे है। श्रम परिवर्तन अधिकारियों द्वारा देश में निरीक्षण के दौरान बाल मजदूर भी पाये जाते है लेकिन कोरम पूर्ति के बाद सब कुछ साफ हो जाता है। विभाग व स्वमसेवी संस्थानों द्वारा बाल श्रम दिवस जागरुकत शिविर भी नहीं चलाया जाता कि जिससे यह कानून देश के अंदर बेअसर साबित हो जाता है।

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ये बच्चे देश के भविष्य है, ये ही संसार को दशा- दिशा देंगे और हमारे कल को बेहतर बनाएंगे। यह बालश्रम वाकई भयावह है कि बच्चों के अबोध मस्तिक को हम तोङने का कार्य कर रहे है। मै चांहता हूं कि आप जब भी इन बच्चों से मिले तो इनसे प्यार से पेश आये जिससे उनका बाल- मन भी कुछ हद तक अपने को अच्छा महसूस करेगा।

शंभू प्रसाद

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