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छोटे क़द के इस कांग्रेसी नेता ने राजनीति में खेली लम्बी पारी फिर अचानक खो गया भीड़ में

तीन बार रह चुके हैं यूपी के मुख्यमंत्री

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी अब हमारे बीच में नहीं है। 93 साल की उम्र में लम्बी बीमारी से 18 अक्टूबर को उन्होंने दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स हॉस्पिटल में आख़िरी साँस ली। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि एनडी तिवारी का निधन उनके जन्मदिन के दिन ही हुआ। एनडी तिवारी का जीवन काफ़ी उतार-चढ़ाव भरा हुआ है। उनके जीवन में कई अच्छे मौक़े भी आए तो कई इतने बुरे मौक़े भी आए, जिसकी वजह से उन्हें काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

आज़ादी की लड़ाई में भी दिया था योगदान:

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एनडी तिवारी का एक बहुत ही लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय नारायण दत्त तिवारी ने भी आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें 1942 में वे जेल भी जा चुके हैं। खास बात यह थी कि वे नैनीताल जेल में बंद किए गए थे, जहां उनके पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से ही बंद थे। आजादी के वक्त तिवारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे। एनडी तिवारी का अधिकांश राजनीतिक जीवन कांग्रेस के साथ रहा। जहां वे संगठन से लेकर सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में रहे। इलाहाबाद छात्र संघ के पहले अध्यक्ष से लेकर केंद्र में योजना आयोग के उपाध्यक्ष, उद्योग, वाणिज्य पेट्रोलियम, और वित्त मंत्री के रूप में तिवारी ने काम किया।

तीन बार रह चुके हैं यूपी के मुख्यमंत्री:

आजादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनावों में नारायण दत्त तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) से सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा था और कांग्रेस के खिलाफ जीत हासिल की थी। तिवारी ने 1963 में कांग्रेस ज्वाइन की थी। 1965 में तिवारी पहली बार मंत्री बने थे। तिवारी तीन बार यूपी और एक बार उत्तराखंड की सत्ता संभाल चुके हैं। नारायण दत्त तिवारी एक जनवरी 1976 को पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने। 1977 में हुए जेपी आंदोलन की वजह से 30 अप्रैल को उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। एन डी तिवारी तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे। नारायण दत्त तिवारी अकेले ऐसे राजनेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद वे उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री बने थे।

चुनाव हारने के बाद चूक गए प्रधानमंत्री बनने से:

कांग्रेस

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हत्या के बाद कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के लिए नारायण दत्त तिवारी का नाम भी चर्चा में आया था। हालांकि नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव वो जीत नहीं सके, जिसके चलते वो प्रधानमंत्री बनने से चूक गए थे। इसके बाद वीपी नरसिम्हा राव पीएम बनने में सफल रहे। हालांकि कांग्रेस पार्टी की कमान जब गांधी परिवार के हाथों से निकली तो वह पार्टी में अलग थलग पड़ गए थे। इसी का नतीजा था कि तिवारी ने 1995 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। लेकिन सफल नहीं रहे। कांग्रेस की कमान जब सोनिया के हाथों में आई तो पार्टी बनाने के दो साल बाद ही उन्होंने घर वापसी की।

विवादों की वजह से कांग्रेस ने नहीं दिया ज़्यादा महत्व:

लेकिन इन दो वर्षों के दौरान कांग्रेस में उनके लिए कोई केंद्रीय भूमिका नहीं रह गई थी। हालांकि बाद में उन्हें राष्ट्रपति का दावेदार माना जाता रहा, लेकिन नहीं बनाया गया। फिर कहा गया हो सकता है उपराष्ट्रपति बना दें। लेकिन इनके विवादों की वजह से उनको कांग्रेस पार्टी ने बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया। कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अलग ढंग से उनका पुनर्वास किया। पहले उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। फिर 2007 में पार्टी चुनाव हारी तो तिवारी का पुनर्वास आंध्रप्रदेश के राज्यपाल के रूप में कर दिया गया। लेकिन सेक्स सीडी सामने आने के बाद कांग्रेस ने उन्हें राज्यपाल के पद से हटा दिया था।


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