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भारत में कब पास होगा घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ ऐसा क़ानून जो पहले ही पास हो चुका है यहाँ

पहले ही पास हो चुका है कनाडा के दो राज्यों में यह क़ानून

Source: Getty Image
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भारत एक ऐसा देश हैं, जहाँ लगभग पाँच मिनट में एक घरेलू हिंसा का केस दर्ज किया जाता है। हालाँकि घरेलू हिंसा के कई मामले होते हैं, लेकिन लगभग 70-80 प्रतिशत मामलों में केस ही नहीं डर करवाया जाता है। भारत में सदियों से महिलाओं को देवी का दर्ज दिया गया है, लेकिन उसी देवी को पुरुष पिटने में भी पीछे नहीं हैं। पुरुष समाज आज भी महिलाओं को पिटना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। आज समय थोड़ा बदल गया है लेकिन आज भी भारत की लगभग 60 प्रतिशत महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसकी तरफ़ ना ही समाज के लोग ध्यान देते हैं और ना ही सरकार कोई क़दम उठा रही है।

 

करती थीं महिलाओं की भलाई के लिए काम:

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Source: www.dailytelegraph

लेकिन हाल ही में न्यूज़ीलैंड की संसद ने घरेलू हिंसा से निपटने के लिए एक सराहनीय क़दम उठाया है। जानकारी के लिए बता दें न्यूज़ीलैंड की संसद ने 25 जुलाई को एक क़ानून पास किया जिसके अंतर्गत घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाएँ 10 दिन की छुट्टी ले सकेंगी और उनकी तनख़्वाह भी नहीं काटी जाएगी। छुट्टियों का इस्तेमाल महिला अपने पति को छोड़ने, नया घर तलाशने और ख़ुद को एवं बच्चों को सुरक्षित रखने का काम कर सकेगी। जानकारी के अनुसार इस महत्वपूर्ण बिल को एमपी जेन ने पेश किया है। जेन एमपी बनने से पहले महिलाओं की भलाई के लिए काम करती थीं।

 

2019 के अप्रैल महीने में लागू होगा यह क़ानून:

ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन में छपी एक ख़बर के अनुसार जेन ने कहा, ‘घरेलू हिंसा से जुड़े मामले सामाजिक ज़िम्मेदारी हैं। इस तरह के मामलों को केवल पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। समाज के सभी लोगों को पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए आगे आना चाहिए। हमें समाज के नियमों को तोड़ना होगा और कहना होगा कि यह सबका मुद्दा है और यह ठीक नहीं है।’ हालाँकि यह क़ानून अभी से नहीं बल्कि अप्रैल 2019 से लागू किया जाएगा। क़ानून के पास होते ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को 10 दिन की छुट्टी मिल रही है या नहीं, यह देखना भी क़ानून का काम है।

 

पहले ही पास हो चुका है कनाडा के दो राज्यों में यह क़ानून:

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Source: Tehrantimes

घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को मिलने वाली यह छुट्टी कर्मचारियों को मिलने वाली अन्य छुट्टियों से अलग होगी। अगर महिला काम करने की जगह या अपने ईमेल को बदलना चाहें तो उन्हें इसकी इजाज़त दी जाएगी। आपको बता दें इससे पहले यह क़ानून कनाडा के दो राज्यों में पास किया जा चुका है। 15 मई 2018 को मानिटोबा में घरेलू हिंसा से बचने के लिए महिलाओं को 10 दिन की छुट्टी देने का क़ानून पास किया गया था। हालाँकि वहाँ 5 दिन की पेड़ छुट्टी और 5 दिन की अनपेड छुट्टी देने का प्रावधान है। इसके साथ ही महिलाएँ 17 सप्ताह की छुट्टी ले सकती हैं।

 

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घरेलू हिंसा से तंग आकर छोड़ दिया अपने पति को:

17 सप्ताह के बाद भी महिलाओं की नौकरी बनी रहेगी। इसी दौरान कनाडा के एक राज्य ओंटारियो में भी यह क़ानून पास किया गया था। इस क़ानून के तहत घरेलू हिंसा और यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं को 10 दिन की पेड छुट्टी दिया जाने का प्रावधान है। महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर 10 दिन से ज़्यादा की भी छुट्टी ले सकती हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें पैसे नहीं दिए जाएँगे। द ग्लोब एंड मेल में छपी एक ख़बर के अनुसार 1988 में मिशेल की माँ कैथी ने घरेलू हिंसा से तंग आकर अपने पति को छोड़ दिया था। बाद में वह अपने पाँच बच्चों के साथ विमन शेल्टर चली गयी थीं।

 

कैथी को करना पड़ा आर्थिक परेशानियों का सामना:

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Source: upr.org

शादी के बाद हमेशा उनके पाती उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहते थे। इससे कैथी परेशान हो गयी और उन्होंने अपने बॉस को कुछ दिनों की छुट्टी देने के लिए कहा, लेकिन बॉस ने उन्हें केवल दो दिन की छुट्टी दी। अगर वो दो दिन बाद ऑफ़िस नहीं जाती तो उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता। आख़िरकार वो ऑफ़िस नहीं पहुँच पायीं, और उन्हें अपनी नौकरी गँवानी पड़ी। नौकरी जाने की वजह से उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। कैथी की नौकरी नहीं जाती तो उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता। इसी तरह की परेशानियों से बचाने के लिए घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून बनते रहे हैं। अब कई देशों ने महिलाओं को घरेलू हिंसा से निपटने के लिए छुट्टी देने का भी क़ानून बनाना शुरू कर दिया है।

 

पहले बदलना होगा महिलाओं को अपनी सोच:

अब देखना यह है कि भारत में इस तरह के क़ानून की बात कब की जाती है। अभी यहाँ सामाजिक तौर पर घरेलू हिंसा को अपराध ही नहीं माना जाता है, ऐसे में इस क़ानून के बनने की कल्पना करना बेकार ही है। पहले तो भारतीय समाज में सबसे बड़ी ज़रूरत है कि लोग घरेलू हिंसा को एक अपराध के तौर पर देखें और सभी लोग इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। इसके बाद ही इस क़ानून के बारे में सोचा जा सकता है। आज भी कई जगहों की महिलाओं का यह कहना है कि उनके पतियों का हक़ है कि वो उनके साथ जो चाहे करें। पहले महिलाओं को अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा।

इस कानून के बारे में और जानें


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