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पांच पराणी पच्चीस छवी तीन सीन का अद्धभुत गढवाली नाटक

गढवाली साहित्य का सौभाग्य है की कोई नरेंद्र कठैत जैसा साहित्य शिल्पी गढवाली भाषा मे है !

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गढवाली साहित्य का सौभाग्य है की कोई नरेंद्र कठैत जैसा साहित्य शिल्पी गढवाली भाषा मे है 
नरेंद्र कठैत के साहित्य वो नाटक व्यंग लेख फीचर स्तम्भ कविता आप तभी समझ सकते है जब आप ने साहित्य के चरम को पढ़ा हो रंगमंच के चरम शास्त्रीयता को देखा जब आपने हरिशंकर परसाई के व्यंग से आपका परिचय हो श्री लाल शुक्ल का राग दरबारी से रूबरू हो आपने भुवनेश्वर के नाटक देखे पढ़े हो आपने लोक से जुड़े हबीब तनवर के नाटक देखें हो साहित्य और रंगमंच की शाष्ट्रीयत से आप लबरेज हो तब आपको साहित्यकार नरेंद्र कठैत का साहित्य या नाटक या व्यंग आप को समझ क्या आयेगा आपको दीवाना बना देगा पांच पराणी ! पांच पराणी पच्चीस छवी तीन सीन का रंगमंच में खेले जाने वाला नाटक है जिसमे पांच पात्र है मंगसिरु , मंगत्या , फजीतु , चैतु और बैसाखू ऐसे पांच मानवों के बीच घूमता यह नाटक बड़े हास्य और चुटीले व्यंग संवादों पर लिखा और गड़ा है यह नाटक बहुत गहरा भाव नाटककार नरेंद्र कठैत ने दिया है नाटक माध्यम से नाटक  के पांच पराणीयो की पच्चीस छवी के डायलॉग को गहरे आत्मसात किया जाए तो यह उत्तराखंड बनने के बाद उत्तराखंड के पहाड़ दर्शन पर व्यंग करता नाटक है जिसका मंचन भी रंगमंच में बहुत शानदार होगा अगर कोई रंगकर्मी इसमें नाटक खेले ।

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इस नाटक में निनारू जैसे जीव की साउंड का भी सुन्दर प्रयोग है मेरी साहित्यकार नरेंद्र कठैत से फ़ोनवार्ता हुयी थी तो उन्होंने कहा था बैकग्राउंड म्यूजिक तो होगा पर यह ढोलक हारमोनियम वाला संगीत नही इसमें रात में आवाज करने वाले जीव निनारू की आवाजों संगीत होगा जिसको चेसखट कहते है निनारू रात को आवाज करने वाले जीव के संगीत की आवाज वो भी कभी ऊंची कभी नीची कभी एक साथ नरेंद्र कठैत जी के मुख से रंगमंच के संगीत में नयेपन की बात सुन सुखद लगा बाकी इस तरह के नये संगीत को जिसमे रात के जीवो का साउंड हो अलग अलग तरीक़े कोई मजा हुआ परक्शन आर्टिस्ट म्युजिशियन सजीव कर सकते हैं   नाटक में गढ़वाली में रनमंच के साउंड के साथ लाइट और सीन पर विस्तृत लिखा गया है तीन सीन के इस गढ़वाली नाटक की पटकथा (स्क्रिप्ट) पढ़ आनंद आ गया गढवाली भाषा में भी तीन खण्ड का इस शास्त्रीयता के साथ एक एक शब्द और संवाद और दृश्य को इतने खूबसूरत तरीके लिखा जा सकता है यह गढ़वाली भाषा सौभाग्य ही है उसमें नरेंद्र कठैत जैसे नाटककार भी है
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