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परेशानियों में घिरा देश का अन्नदाता। कब होंगी मुसीबतें कम ?

Source - The Dialogue
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जैसे ही आम लोगों ने सुना फलां दिनांक से फलां तक किसानों का आंदोलन चालू हो रहा है और इस बीच शायद सब्ज़ी,दूध नहीं मिले वैसे ही खलबली मच गई.सब्जी मंडियों पर लोगों की भीड़ इकट्ठी सब्ज़ी लेने पहुंच गई (बाक़ी देश का तो नहीं पता लेकिन मध्यप्रदेश में तो यही हाल था. चूंकि किसानों के बंद का मुख्य केन्द्र यही प्रदेश था)तो कहने का मतलब ये है कि अन्न-जल-हवा हमारे जीने का मुख्य स्त्रोत है और एक भी दिन हम इससे समझौता नहीं कर सकते, लेकिन हमें अहसास है कि हमारा अन्नदाता कितने संकट में है?farmer sucide

‌किसी ज़माने में गांव के लोगों में वो शहरी बीमारी नहीं होती थी लेकिन आज देखने में आता है कि किसान को शुगर हो रही है वो हार्ट अटैक,ब्रेन हैमरेज का शिकार हो रहा है और इन सबका कारण है तनाव,सदमा वगैरह. अब होंगे क्यों नहीं जब फ़सल के दाम दो रुपए किलो मिलेंगे जो लागत से भी कम हैं(ऊपर से कहीं कोई मुआवज़ा है सरकारी तंत्र का भ्रष्टाचार और बेरुख़ी के कारण मुहावज़ा पाने में विलंब) तो उसे पाने में तमाम दिक्कतें) मौसम बरसात,ओलों से मेहनत से उगाई फसल पल भर में उजड़ जाती है और पता चला इन सब हालात में कर्ज़ कैसे चुकाएं और खुद भी क्या खाएं और कहीं मजबूरीवश सूदखोरों से कर्ज़ ले रखा है तो ऐसे हालात में उनके महंगे कर्ज़ को चुकाने के लिए तो उसे अपने खेत ही बेचने पड़ते है या न चुका पाने के हालात में या तो सदमे, दबाव में जान ही जा रही है या आत्महत्या ही करनी पड़ रही है और इन सब के बीच बच्चों की शिक्षा,शादी के लिए खर्चे की इंतज़ाम, वो तो भूल ही जाएँ।
तो है न कितने संकट में किसान…ये संकट आज का नहीं है ये तो बहुत पुराना है ये मुद्दा है ख़ासकर छोटे और लद्यु किसान का। किसान के साथ हर सरकार में छल किया है, क्योंकि किसी ने भी अन्नदाता को प्राथमिकता में नहीं रखा है. सब एक दूसरे के ऊपर दोष मढ़ते रहे हैं और वोट बैंक के लिए ही इस्तेमाल करते और उसी को ध्यान में रखते हुए वादे और घोषणा करते रहे हैं.ठोस नीति किसी के भी पास नहीं हैं. लेकिन बात वर्तमान की जाए तो देश स्मार्टसिटी, बुलेट ट्रेन के शोर में ही दबके रह गया हैं. स्मार्टसिटी और बुलेट ट्रेन के लाखों करोड़ के खर्चे को वहन करने को तो हम तैयार हैं लेकिन किसान के हित को हमने कहीं पीछे ढकेल दिया है. देश का मुख्य  बजट सेना,किसान और युवाओं के लिए आरक्षित होना चाहिए लेकिन वो तो कहीं और ही मुड़ गया है जिसकी शायद देश को वर्तमान में आवश्यकता ही नहीं है या जिसके ऊपर इतने बड़े-बड़े ख़र्चे सहीं नहीं हैं. वैसे इस बार के बजट में भी फ़सल की लागत से डेढ़ गुना देने की घोषणा की(लेकिन असली लागत कैसे निकालेंगे?) इसके साथ ही इससे जुड़ी कई और भी घोषणाएं भी की है जो जब तक ज़मीन में नहीं आ जाती और जब तक इनका किसानों को कोई लाभ नहीं मिलता और इन घोषणाओं से कितना फ़ायदा होता है ये मालूम नहीं चलता तब तक इन घोषणाओं को हितकारी कहना संभव नहीं हैं, वैसे किसानों के लिए सरकार को अपने गठन के साथ ही अपने पहले ही बजट में विशेष ध्यान देना चाहिए था लेकिन नहीं।

source – The Hindu

अकेले कर्ज़ा माफ़ी और फ़सल के उचित दाम से ही किसानों का भला नहीं होने वाला. ये देख़ना ज़रूरी है कि आधुनिक खेती की तकनीक जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से देश में आती है तो उसे कृषि का प्रसार-प्रचार तंत्र वाकई किसानों तक पहुंचा रहा हैं? या हम पहुंचाने में कितने लाचार है क्योंकि इस देश में कृषि काॅलेज और विश्वविद्यालय ही कितने हैं। तो किसान को आधुनिक खेती के साथ मत्सय पालन,मुर्गी पालन आदि के विकल्प जोड़के उनकी कमाई बढ़ाने के लिए हम अपने तंत्र को फैलाने की ठोस योजना बनानी होगी, बड़ा बजट तय करना होगा. आजकल सुनने में आता है कि एक शिक्षित युवा बड़ी नौकरी के पैकेज छोड़ छोटी ज़मीन पर ही आधुनिक खेती कर बड़ा मुनाफ़ा कमा रहा है. वहीं पहले से ख़ेती करता आ रहा किसान आज भी दर-दर की ठोकरें खा रहा है, संकट में है. तो इसके लिए उसे जागरूक करने के लिए ठोस योजना बनानी होगी, शिक्षित करना, ट्रेनिंग देनी होगी। बजट का मुख्य हिस्सा कृषि के लिए निर्धारित करना होगा,प्राथमिकता में रखना होगा. सिर्फ वोट के लिए इस्तेमाल नहीं करना होगा। ऐप वगैरह लांच से अकेला कुछ नहीं होगा धरातल पर पहुंच बनानी होगी, गांव-गांव में काॅलेज,विश्वविद्यालय,ट्रेनिंग एवं जागरूकता केंद्र स्थापित करने होंगे,इन्हीं सब को देखते हुए किसानों के बच्चों को आधुनिक ख़ेती से जोड़ने के लिए योजना बनानी होगी. सरकार आम जनता से कृषि कल्याण सेस अवश्य लें लेकिन उसे सकारात्मक दिशा में लगा कर किसान का भला करें। देश की सत्तर फीसदी आबादी जो खेती पर आश्रित है के लिए सरकार को ठोस योजना तो तय करनी ही होगी और इसी के साथ स्वामीनाथन आयोग जो भी सिफारिशें मुमकिन हो उसे लागू करना ही होगा. इन सब के बाद ही किसान के बड़े संकट का हल निकलने की उम्मीद हैं।


रिपोर्ट – सौरभ अरोड़ा (ग्वालियर)

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