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रिक्शाचालक से प्रिंसिपल बनने की इस व्यक्ति की कहानी देती है हर किसी को हौसला

शीशम के पेड़ के नीचे शुरू किया 12 बच्चों को पढ़ाना

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सुल्तानपर लोधी स्थित ननकाना चैरिटेबल स्कूल के प्रिंसिपल भूषण पासवान की कहानी किसी फ़िल्म की कहानी से कम नहीं है। आपको बता दें किसी ज़माने में वह रिक्शा चलाते थे। नशे के शिकार थे, इस वजह से जितना कमाते थे सब नशे पर ख़र्च कर देते थे। वहीं नहीं उनका परिवार भी इस लत की वजह से परेशान था। ऐसे मुश्किल भरे समय में काली बेईं का उद्धार करने वाले संत बलबीर सिंह सींचेवाल गुरु बनकर उनकी ज़िंदगी में आए और उनकी ज़िंदगी ही बदल गयी। दसवीं तक पढ़े भूषण ने ना केवल शराब छोड़ दिया, बल्कि आगे की पढ़ाई भी शुरू कर दी।

 

किसी-किसी तरह से होता था परिवार का गुज़ारा:

भूषण की मेहनत रंग लायी और आज वह ग़रीब बच्चों की अंधेरी ज़िंदगी में उजियारा ला रहे हैं। उन्होंने अब तक 750 बच्चों को शिक्षित किया है। पुराने दिनों को याद करते हुए बिहार के नालंदा जिले के नेपुरा गाँव के निवासी भूषण बताते हैं कि अब से 13 साल पहले मेरी ज़िंदगी इस तरह की नहीं थी। मैं सुल्तानपुर लोधी में रिक्शा चलाया करता था। मैं शराब और जुए की लत से भी परेशान था इस वजह से पूरी कमाई उसी पर उड़ा देता था। मेरी माँ कलावती लोगों के घरों में बर्तन माँजती थी और परिवार का किसी तरह से पालन करती थी। परिवार झुग्गी में रहता था।

 

शीशम के पेड़ के नीचे शुरू किया 12 बच्चों को पढ़ाना:

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भूषण ने आगे बताया कि 13 दिसम्बर 2005 को संत बलबीर सिंह सींचेवाल सुल्तानपुर लोधी में आए। उन्होंने झुग्गी में रहने वाले लोगों को बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि अगर आपमें से कोई पढ़ा लिखा हो तो वह इन बच्चों को पढ़ा सकता है। मैंने नालंदा के माफ़ी हाईस्कूल से मैट्रिक पास कर रखी थी। इसलिए लोगों ने मेरा नाम बताया। संत ने मुझसे पूछा कि क्या लोगों को पढ़ा सकोगे। मैंने कहा कि में वादा तो नहीं कर सकता, लेकिन हाँ में कोशिश ज़रूर कर सकता हूँ। इसके बाद भूषण काली बेईं नदी के किनारे शीशम के पेड़ के नीचे 12 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

 

हर सुबह दो बोतल शराब पीते थे भूषण:

धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी, लेकिन नशे की लत अभी तक नहीं छूटी थी। संत सींचेवाल ने इसके बारे में पूछा तो मैंने बताया कि हर सुबह दो बोतल शराब पी लेता हूँ। बाबा ने बताया कि अगर शिक्षक शराबी-जुआरी होगा तो उसका बच्चों के ऊपर कैसा प्रभाव पड़ेगा। उनके घंटों समझाने के बाद उनकी बात समझ में आयी और मैंने शराब की लत छोड़ दी। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते भूषण का भी आगे पढ़ने का मन करने लगा। 2006 में पढ़ाई शुरू की और आलिंगर के आरलाल कॉलेज से इंटरमिडिएट की परीक्षा पास की। इसके बाद बिहारशरीफ़ के अल्लामा इक़बाल कॉलेज से बीए की परीक्षा भी पास की।

 

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अकेले शुरुआत करने वाले स्कूल में अब 12 शिक्षक:

इसके बाद भूषण ने सुल्तानपुर लोधी स्थित ननकाना चैरिटेबल स्कूल में पढ़ना शुरू किया। इसके बाद वह वहाँ के प्रिंसिपल भी बन गए। इस स्कूल में अब 172 बच्चे मुफ़्त में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। ये बच्चे बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आकर सुल्तानपुर लोधी की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के हैं। 2008 में हिंदी मीडियम इस स्कूल की शुरुआत हुई थी। इस स्कूल में शिक्षक के तौर पर अकेले भूषण ने शुरुआत की थी, अब यहाँ कुल नौ शिक्षक पढ़ा रहे हैं। भूषण के पढ़ाए बच्चों में से एक रवि कुमार बीटेक कर इस समय दिल्ली में छः महीने की ट्रेनिंग ले रहे हैं। अजय कुमार और राम कुमार बिहार के कृषि विभाग में नौकरी कर रहे हैं।

 

धर्म के मामले में नहीं लगायी कोई पाबंदी:

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लगभग 78 लड़के और लड़कियाँ बिहार और पंजाब में प्लस टू के आगे पढ़ रहे हैं। आपको बता दें इस स्कूल में बच्चों को खाना-पीना भी ट्रस्ट की तरफ़ से मुहैया करवाया जाता है। अब भूषण भी बीएड करने के बारे में सोच रहे हैं। भूषण कहते हैं कि अब वह बीएड करना चाहते हैं। अपने स्कूल को बढ़ाकर प्लस टू तक करने की कोशिश करेंगे, ताकि बच्चों को किसी दूसरे स्कूल में ना जाना पड़े। भूषण पासवान ने संत सींचेवाल से नामदान ले लिया है और केस और दाढ़ी रखकर सिंह सज गए हैं। वह सिखों की तरह पगड़ी भी पहनते हैं। लेकिन उन्होंने अपनी बेटी की शादी हिंदू रीति-रिवाज से ही की है। भूषण का कहना है कि संत सींचेवाल ने धर्म के मामले में उनके ऊपर कोई पाबंदी नहीं लगायी है।

 

होना चाहिए सच्चा और नेक इंसान:

भूषण ने बताया कि वह तो सिख धर्म अपनाने के लिए तैयार थे लेकिन संत जी ने इस मामले में पूरी तरह स्वतंत्र कर रखा है। संत सींचेवाल का कहना है कि यह तुम्हारे मन और विवेक का विषय है। व्यक्ति किसी भी धर्म में हो कोई दिक़्क़त नहीं, बस उसे सच्चा और नेक इंसान होना चाहिए। संत ने बताया कि पहली बार जब भूषण से मिला था तो इसकी हालत कुछ और ही थी। शराब और जुए की लत के कारण इसको कोई पसंद नहीं करता था। आज वह अपने आप को काफ़ी बदल चुका है। ग़रीब बच्चों को शिक्षित करने में वह अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

 


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