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लोकगीतों के युग का नाम कबूतरी देवी : पहाड़े को ठंडो पाणी ।

उत्तराखंड के विशुद्ध संगीत घरानों मिरजई परम्परा की कलाकार

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 उत्तराखंड की स्वर कोकिला कबूतरी देवी का आज वाली कबूतरी देवी जी का 7 जुलाई 2018 को पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल में निधन हो गया। कबूतरी देवी के स्वर कण्ठ उत्तराखंड की वादियों और कुमाऊनी लोकगीत और ऑडियो वीडियो रेडियो रिकॉर्ड में उनकी आवाज सदा कानों में गूंजती रहेगी ! कबूतरी के कण्ठ और स्वरों में लोक की एक अलग ही मिठास थी ! उत्तराखंड की पहली महिला लोकगायिका के रूप में अपनी पहचान बनाई थी !

 

भारत – नेपाल सीमा में हुआ था जन्म

Kabutar devi

कबूतरी देवी का जन्म नेपाल-भारत की सीमा के पास पिथौरागढ़ के लेटी गावों 1945 के लगभग हुआ था ! उनके पिता देवी राम और माता का नाम देवकी था ! कबूतरी के माता पिता लोक संगीत के जानकर और अच्छे गायक थे। जब कबूतरी देवी का जन्म हुआ देश गुलामी जंजीरों में जकड़ा हुआ था और आजादी की बेला नजदीक थी ।

कबूतरी देवी एक लोक संगीत घरानों में पैदा हुई लडक़ी थी , जिसने अपने घर परिवार में तबले ढोलक की थाप सारंगी तारो में हारमोनियम के कीबोर्ड में लोक संगीत की धुनों को बचपन से घर मे सुना हुआ था ! यह लोक धुने कबूतरी देवी के मन मस्तिष्क कभी विस्मृत नही हुई ! गरीबी लाचारी के साथ बढ़ती उम्र में आंखों के चश्मे का नम्बर बढ़ने पर नया चश्मा लाने की असमर्थता और कानों में कम सुनाई देने पर कानों की मशीन खराब हो जाने नये मशीन लाने की असमर्थता ने भी कभी कबूतरी देवी के सुरो को सुनने देखने समझने की शक्ति हारमोनियम में कभी कम नही हुयी ! उम्र आखिर पड़ाव तक भी उनके कण्ठ में वही खूबसूरती थी जिसके के लिए वो जानी जाती थी ।

 

गाँव से लेके आकाशवाणी तक का सफर

कबूतरी देवी का विवाह 14 वर्ष की अल्पायु में जिला पिथौरागढ़ क्वीतड़ (ब्लॉक मूनाकोट) निवासी देवी राम से हुआ ससुराल की kabutari-devi-tejanbai-of-uttarakhandआर्थिक स्तिथि कुछ ठीक नही थी पति समाजिक कार्यकर्ता थे उनका छोटा मोटा काम था ! और अपने इलाके में ‘नेताजी’ के नाम से जाने जाते थे। नेताजी ने अपनी निरक्षर पत्नी की प्रतिभा को निखारने और उन्हें मंच पर ले जाने का अनूठा काम किया। कबूतरी को ससुराल में मायके की तरह संगीत महौल तो नही मिला लेकिन कबूतरी के पति संगीत के शौकीन थे उन्होंने ही कबूतरी को रेडियो मंचो में गाने में कबूतरी काफी सहायता की ! उस समय के प्रसिद्ध संगीतज्ञ और गीतकार प्रसिद्ध लोकगायक भानुराम सुकौटी जिनके लोक गीत रिकार्ड आज भी रेडियो और यू ट्यूब पर बजते है उन्होंने भी कबूतरी के संगीत सफर में काफी साथ दिया । आज भी चूल्हे-चौके और खेती-बाड़ी के काम में उलझकर पहाड़ की न जाने कितनी महिलाओं की प्रतिभाएं दम तोड़ रही होंगी। लेकिन दीवानी राम जी निश्चय ही प्रगतिशील विचारधारा के मनुष्य रहे होंगे, जिन्होंने अपनी 70 के दशक में अपनी पत्नी में संगीत की रुचि को न केवल बढ़ावा दिया बल्कि उनको खुद लेकर आकाशवाणी नजीबाबाद और आकाशवाणी रामपुर पहुंचाया। क्वीतड़ से कई घण्टे पैदल चलकर बस पकड़ने के बाद नजीबाबाद पहुंचने के सफर की चुनौतियों का आज हम लोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं।

 

संघर्ष की मिसाल कबूतरी देवी

सत्तर के दशक में कबूतरी देवी पति के सहयोग से रेडियो स्टेशन मंचो में गाने लगी ! वही कबूती देवी रेडियो में A ग्रेड वोकल आर्टिस्ट और संस्कृति विभाग की सम्मानित कलाकार रही ! कबूतरी रेडियो से काफी प्रसिद्धि मिली उनके रिकॉर्ड गीत आज भी रेडियो से बजते है उनके गाये गीतों के पुराने रिकॉर्ड को आज भी लोग ऑनलाइन यूट्यूब और फेसबुक पर सुनते है कबूतरी देवी मंचो पर जब हारमोनिय के साथ लोकगीतो को गाती तो लोग उनको कुमाऊनी गीतों की स्वर कोकिला के साथ उत्तराखंड kabutari-devi-tejanbai-of-uttarakhandकी तीजनबाई भी कहते हैं ! लोक संगीत में कबूतरी देवी ने वो मुकाम हासिल किया जब तक उनके पति जीवित थे तो वो उनको मंचो रेडियो में ले जाते थे किंतु पति के मृत्य के बाद आर्थिक तंगी के साथ मंचो और रेडियो में गाना भी कम हो गया कबूतरी देवी एक घरेलू अनपढ़ महिला थी बड़ी बड़ी म्युजिक क़म्पनियो से दूर ही रही जबकि उनको ऑफर थे। घर परिवार की जिम्मेदारी और कमजोर आर्थिकता के साथ वो गांवो में ही जीवन भर रही पति की मृत्यु ने उनकी कला को जैसे बांध ही दिया वो पहाड़ के छोटे मोटे कार्यक्रमो यदा कदा गाती थी पर बडे स्टेज शो और एल्बम कबूतरी देवी को कभी नसीब नहीं हुए ! जीवन के अंतिम दशकों में सँस्कृति विभाग की तीन हजार रुपये पेंशन मे जैसे तैसे गुजारा हो रहा था पेंशन भी समय पर नही मिलती थी और उसमे भी काफी अनिमियता रही !

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हमारी सरकारे, समाज ने भले कबूतरी देवी को उत्तराखंड स्वरकोकिला या उत्तराखंड तीजनबाई कई नाम दिए पर ऐसे कलाकार कैसे इतनी पीड़ाओं में इतना सुरीला मेलोडियस गा लेते हैं कैसे हँस हँस कर संस्कृति की सेवा में किन्तु जीवन लगा देते हैं ऐसे कलाकारो के साथ इंसाफ बहुत कम होता हैं कबूतरी देवी जैसी कलाकार जो उत्तराखंड विशुद्ध लोकशैली लोककलाकार थी मिरजई घरानों के लोक दर्शन जिनके स्वर और संगीत में था ये सब न उनको मजबूत आर्थिकता दे पाए न बड़े भव्य मंच न कोई पदमश्री जैसा प्रुस्कार ! माना कि कई राष्ट्रीय पुरस्कार से वो सम्मानित हुई ! थी पर कबूतरी के सुरों में उसकी दुःख पीड़ाओं की खबर तो अखबार टीवी में आती रही पर उन्हें वो हक़ वो सम्मान नहीं दिला पाई जिसकी वो हकदार थी ।

कबूतरी देवी ने शिखर पर पहुंचने का सफर शुरू कर दिया था। लगभग हर शाम रेडियो पर उनके गीतों को सुनने का जबरदस्त ‘क्रेज’ था। “पहाड़को ठंडो पानि”, “आज पानि झाऊ झाऊ” जैसे कुछ गानों ने कबूतरी दी को उत्तराखंड के हर घर में पहुंचा दिया था। रेडियो स्टेशन में गानों पर मिलने वाली राशि बहुत कम होती थी, इसलिए घर चलाने के लिए खेती-मजदूरी के बीच ही उत्तराखंड की ये पहली लोकगायिका अभावों में रहते हुए अपने 3 बच्चों को भी पालती रही। उनकी आवाज में मौलिकता और भारत-नेपाल की मिलीजुली खनक तो थी ही, उनके गीतों में मधुरता के साथ साथ दिल को छू लेने वाली ‘नराई’ भी थी। जल्दी ही उनके गीत महिलाओं-पुरुषों और बच्चों के दिलों में बस गए।

 

पहाड़े ठंडो पाणी, तेरी जैसी मीठी बाणी, छोड़न नी लागनी !

kabutari-devi-tejanbai-of-uttarakhandकबूतरी देवी के जीवन में इंतज़ार ही रहा कभी वो पेंशन के लिए तरसी रही तो कभी गैस सिलेंडर के लिए तो कभी स्तरीय मंच कला प्रदर्शन यह खबरे अखबारों और मीडिया के माध्यम से आती रही , पर उनका संगीत औऱ जीवन सँघर्ष अंतिम साँसों तक चलता रहा । आखिर समय भी उनके जीवन की साँसों को बचाने के लिए जिला अस्पताल पिथौरागढ़ 6 जुलाई 2018 को हायर रैफर सेंटर की हैलीकॉप्टर की राह देखता रहा ! हैलीकॉप्टर कब आता कब आता इस इंतिजारी में शनिवार 7 जुलाई 2018 सुबह तक कबूतरी देवी की सांसें रुक गयी इन साँसों के रुकने से सिर्फ एक गायिका नही उत्तराखंड लोकगायिकी एक युग की साँसें थम गई ! कबूतरी देवी एक पारम्परिक लोक घराने की कलाकार थी जिनको मिरजई या बेड़ा परम्परा कलाकार कहा जाता है कबूतरी देवी के कण्ठ और संगीत में उत्तराखंड संगीत घरानों विशुद्ध दर्शन था !

कबूतरी देवी के गीत की कुछ पंक्तियां बार बार याद आ रही हैं।

इस्टेशन सम्मा पुजै दे मैं लई, पछिन बिराना ह्वै जौंला (मुझे स्टेशन तक पहुंचा दो, फिर हम अजनबी हो जाएंगे)
पहाड़े ठंडो पाणी, तेरी जैसी मीठी बाणी, छोड़न नी लागनी !

अलविदा कबूतरी देवी !


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