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प्रेमी जोड़े जो घर से भागते हैं, उन्ही इस महादेव मंदिर में मिलता है सहारा, भोलेनाथ स्वयं करते हैं रक्षा

पंडित करता है प्रेमी जोड़े की ख़ातिरदारी

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महादेव के भारत भर में हज़ारों मंदिर हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी ख़ासियतों की वजह से पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। आज हम आपको महादेव के एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। हिमांचल प्रदेश की ख़ूबसूरती से तो आप सभी लोग वाक़िफ़ होंगे। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। लेकिन कुल्लू के शांघड गाँव के देवता शंगचूल महादेव के बारे में जानकर आप हैरान हो जाएँगे। अक्सर आपने लोगों को यह कहती हुयी सुना होगा कि जिसका कोई नहीं होता है, उसका भगवान होता है, तो यह कहावत यहाँ बिलकुल सही बैठती है।

 

मंदिर फैला हुआ है लगभग 100 बीघे में:

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जी हाँ कुछ प्रेमी जोड़ों की दुश्मन पूरी दुनिया होती है। उन्हें कोई सहारा नहीं देता है। लेकिन जब कोई घर से भागा हुआ प्रेमी जोड़ा शंगचूल महादेव के मंदिर में आता है तो उसे भगवान आसरा देते हैं। केवल यही नहीं महादेव उस प्रेमी जोड़े की रक्षा भी ख़ुद ही करते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें शांघड गाँव कुल्लू से 58 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि जो भी प्रेमी जोड़ा इस मंदिर की सीमा में रहता है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता है। मंदिर लगभग 100 बीघे में फैला हुआ है।

 

मंदिर प्रांगण में नहीं घुसती है पुलिस:

जब कोई प्रेमी जोड़ा घर से भागकर इस मंदिर में पहुँचता है तो उसे भगवान की शरण में माना जाता है। इस गाँव के लोग परम्परा का सदियों से पालन कर रहे हैं। इस गाँव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। शंगचूल महादेव मंदिर में प्रेमी जोड़े को किसी बात के लिए मजबूर करना या विवाद करना पाप माना जाता है। इसी वजह से यहाँ ये प्रतिबंधित है। मंदिर क्षेत्र में शराब, सिगरेट या अन्य किसी तरह के नशे की मनाही है। चमड़े का सामान लेकर आना भी इस मंदिर में मना है। इस मंदिर में किसी भी तरह के हथियार के साथ घुसना भी मना है।

 

पंडित करता है प्रेमी जोड़े की ख़ातिरदारी:

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प्रेमी जोड़ा जब तक इस मंदिर में रहता है, यहाँ के पंडित उसकी ख़ातिरदारी करते हैं। अज्ञातवास के समय इसी मंदिर में पांडव रुके हुए थे तब कौरव उनका पीछा करते हुए यहाँ पहुँच गए थे। तब शंगचूल महादेव ने कौरवों को यह कहते हुए वापस लौटा दिया था कि यह मेरा क्षेत्र हैं और जो मेरी शरण में आएगा उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। उसके बाद कौरव वापस लौट गए थे। तभी से यह परम्परा चली आ रही है। जानकारी के अनुसार एक बार 2015 में रात के समय मंदिर में आग लग गयी थी। इससे मंदिर में रखी मूर्तियाँ नष्ट हो गयी थीं, बाद में फिर से इसका निर्माण करवाया गया।

 

 


 

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