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12 साल की उम्र में यह नन्हा बालक अंग्रेज़ों की गोली खाकर बना शहीद, जानिए पूरी कहानी

बाजीराव का बलिदान हो गया इतिहास की पन्नों में अमर

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15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ था। आज़ादी की लड़ाई में भारत के कई जाबाज़ों ने अपने जान की बाज़ी लगा दी थी। कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें आज पूरा देश याद करता है, वहीं कई ऐसे भी शहीद हैं, जिन्हें आज कोई जानता भी नहीं है। वह इतिहास के पन्ने में कहीं खो गए हैं। ऐसा ही एक जाँबाज़ थे, बाज़ी राउत जिन्होंने 12 साल की उम्र में अपने सीने पर गोली खाई थी। ये इतिहास के पन्नों में सबसे कम उम्र के शहीद के रूप में दर्ज हो गए हैं। आज हम आपको उनसे जुड़े कुछ मज़ेदार फ़ैक्ट्स बताने जा रहे हैं।

 

जनता का शोषण करने के लिए जाना जाता था राजा:

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जानकारी के अनुसार बाज़ी राउत का जन्म 1926 को ओडिशा के ढेंकनाल में हुआ था। बाज़ी राउत की शहादत ने पूरे देश के जाबाज़ो में जोश के साथ ही ग़ुस्सा भी पैदा किया। बाज़ी के पिता हरी राउत एक नाविक थे। कम उम्र में ही पिता की मृत्यु के बाद माता ने पालन-पोषण किया। माँ आस-पास के लोगों की खेती का छोटा-मोटा काम किया करती थी। उस समय ढेंकनाल के राजा शंकर प्रताप सिंहदेव लोगों का शोषण करने के लिए जाना जाता था। ओडिशा में अंग्रेज़ों के साथ ही राजाओं ने भी जनता पर ख़ूब ज़ुल्म किया था।

 

वानर सेना में शामिल थे बच्चे भी:

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ढेंकनाल के रहने वाले वैष्णव चरण पटनायक ने बग़ावत की शुरुआत की। इन्होंने प्रजामंडल नाम से एक दल की शुरुआत की। इस दल की एक वानर सेना भी थी, जिसमें छोटी उम्र के बच्चे शामिल किए गए थे। इसी वानर सेना का हिस्सा बाज़ी राउत भी थे।

पटनायक रेलवे में पेंटर की नौकरी करने के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में बग़ावत की इस आग को फैलाने का काम करते थे। राजाओं और अंग्रेज़ों की तानाशाही की वजह से धीरे-धीरे जनता एक होने लगी थी। इसकी जानकारी जैसे ही अंग्रेज़ों और अन्य राजाओं को हुई, उन्होंने सिंहदेव की मदद के लिए सैनिक और हथियार भेजे।

 

नाव से पहुँचा दे उस पार:

10 अक्टूबर को अंग्रेज़ी पुलिस ने गाँव के कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया और उन्हें भुवनेश्वर थाने में ले गयी। उन लोगों को रिहा करने के लिए गाँव के लोग प्रदर्शन करने लगे। इस दौरान पुलिस ने गोलियाँ भी चलाई, जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गयी। इसके बाद गाँव वालों का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। यह देखते हुए अंग्रेज़ी सेना ने गाँव छोड़ने का मन बना लिया। पुलिस ने ब्राह्मणी नदी के निलकंठ घाट से होते हुए ढेंकनाल की तरफ़ भागने की कोशिश की। बाज़ी राउत वहीं अपनी वानर सेना के साथ पहरा दे रहे थे। रात में पुलिस घाट के पास पहुँची। घाट के पास नाव थी। अंग्रेज़ी पुलिस ने कहा कि उन्हें नाव से बाज़ी राउत उस पार पहुँचा दे।

 

बाजीराव का बलिदान हो गया इतिहास की पन्नों में अमर:

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बाज़ी राउत ने पुलिस की एक ना सुनी और चुपचाप खड़े रहे। यह देखकर दुबारा पुलिस ने पूछा तो भी बाज़ी राउत के कोई जवाब नहीं दिया। प्रजामंडल के उच्च कार्यकर्ताओं ने बाज़ी राउत को रातभर घाट पर पहरा देने के लिए कहा था।

कार्यकर्ताओं को सचेत करने के लिए जब बाज़ी राउत ने शोर मचाना शुरू किया तो ग़ुस्से में अंग्रेज़ी पुलिस ने उनके सिर पर बंदूक़ के बट से हमला कर दिया। ख़ून से लथपथ बाज़ी फिर भी वहाँ से नहीं हटे। यह देखकर अंग्रेज़ी पुलिस ने बाज़ी राउत को गोली मार दी। जबतक कार्यकर्ता वहाँ पहुँचते बाज़ी को गोली लग चुकी थी। बाज़ी की आवाज़ सुनकर मौक़े पर कई गाँव वाले पहुँच गए। यह देखकर अंग्रेज़ वहाँ से भागने लगे। इस दौरान उन्होंने कई गाँव वालों पर भी गोलियाँ चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए। 10 अक्टूबर 1938 को दिया गया बाज़ी का वह बलिदान इतिहास के पन्नो में हमेशा के लिए अमर हो गया।

 

 


 

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