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जानिए कुमाऊँ की लोक कला ऐपण, जो आज है ख़ात्मे की कगार पर

अलग-अलग अवसरों पर बनायी जाती है अलग-अलग आकृतियाँ

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भारत एक बहुत विशाल और विविधता से भरा हुआ देश है। यहाँ कई धर्म, जाति, रंग-रूप, क्षेत्र के लोग आपस में मिलकर बड़े प्यार से रहते हैं। हालाँकि भारत कई राज्यों में बँटा हुआ है। हर राज्य की अपनी एक अलग संस्कृति और कला है, इसके बाद भी यहाँ किसी तरह का विवाद नहीं होता है। हालाँकि कुछ लोग हैं, जो क्षेत्रवाद को हर समय बढ़ावा देते हैं। ऐसे लोगों की वजह से समाज में कभी-कभी तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। हालाँकि आज हम आपको समाज के तनाव के बारे में नहीं बल्कि एक ऐसी लोक कला के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आज ख़ात्मे की कगार पर है।

 

अलग-अलग समुदायों में होते हैं लाक्षणिक अंतर:

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बता दें हम आज आपको कुमाऊँ की देहरी और दीवार सजाने की लोक कला लिख थाप, थापा यानी ऐपण के बारे में बताने जा रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें इसकी रचना में अलग-अलग समुदायों में कई तरह के प्रतीक और लाक्षणिक अंतर देखने को मिलते हैं। साहो और ब्राह्मणों के ऐपण में सबसे बड़ा अंतर यह है कि ब्राह्मणों में चावल की पिष्ठि निर्मित घोल से धरातलीय अल्पना अनेक आलेखन प्रतीकों, कलात्मक डिज़ाइन, बेलबूटों में प्रकट होती है। वहीं साहो में धरातलीय आलेखन ब्राह्मणों के जैसे ही होते हैं, लेकिन इसमें भित्ति चित्रों की रचना ठोस परम्परा है।

 

अलग-अलग अवसरों पर बनायी जाती है अलग-अलग आकृतियाँ:

किसी भी माँगलिक कार्य के अवसर पर कुमाऊँ में अपने घरों को ऐपण द्वारा सजाने की परम्परा है। यह सदियों पुरानी परम्परा है। ऐपण शब्द का उदय संस्कृत के अर्पण शब्द से हुआ है। इसमें घरों के आँगन से लेकर मंदिर तक को प्राकृतिक रंगों, जैसे गेरू एवं पिसे हुए चावल के घोल (बिस्वार) से अनेक तरह की आकृतियाँ बनायी जाती हैं। ऐपण में बनायी जानें वाली मुख्य डिज़ाइन चौखाने, चौपड़, चाँद, सूरज, स्वस्तिक, गणेश, फूल-पत्ती, बसंत्धारे, पो और इस्तेमाल किए जानें वाले बर्तन की आकृति मुख्य है। अलग-अलग अवसरों के हिसाब से अलग-अलग ऐपण डिज़ाइन बनाने की भी परम्परा है।

 

धीरे-धीरे लोग भूलने लगे हैं ऐपण का महत्व:

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दीपावली में बनाए जानें वाले ऐपण में माँ लक्ष्मी के पैर घर के बाहर से अंदर की तरफ़ आते हुए गेरू और पिसे हुए चावल के घोल से बनाए जाते हैं। दो पैरों के बीच ख़ाली स्थान पर गोल आकृति बनाई जाती है, जो धन का प्रतीक माना जाता है। पूजा कक्ष में लक्ष्मी जी की चौकी बनाई जाती है। इनके साथ लहरों, फूल-मालाओं, सितारों, बेल-बूटों और स्वस्तिक की आकृतियाँ बनायी जाती है। आज के इस आधुनिक समय में धीरे-धीरे लोग पारम्परिक रूप से बनाए जानें वाले ऐपण के महत्व को भूलते जा रहे हैं और प्राकृतिक रंगों की जगह सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं।

 

ज़रूरत है लौटने की संस्कृतियों और परम्पराओं की तरफ़:

उत्तराखंड के शहरी इलाक़ों में यह लोक कला धीरे-धीरे ख़ात्मे की कगार पर है, जबकि ग्रामीण अंचलों में आज भी यह परम्परा काफ़ी समृद्ध है। इस लोक कला को जीवित रखने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएँ काम कर रही हैं। कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर ऐपण कला सिखाने के लिए प्रशिक्षण शिविर लगाए जाते हैं। किसी भी समुदाय की संस्कृति और कला ही उस समुदाय की पहचान होती है। लेकिन आधुनिक समय में लोग धीरे-धीरे अपनी संस्कृतियों और परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। पुरानी संस्कृतियों और परम्पराओं को जीवित रखने के लिए ज़रूरत है हमें एक बार फिर से अपनी संस्कृति और परम्पराओं की तरफ़ लौटने की।

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