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जानिए भारत के ऐसे मंदिर के बारे में जहाँ बिना सूंड के विराजित हैं श्री गणेश

मंदिर की तलहटी में हुआ था अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन

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हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। लेकिन हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता की पूजा से पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में इन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। कोई भी माँगलिक कार्य हो या कोई पूजा-पाठ, सबसे पहले श्री गणेश का आह्वान किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में यह वर्णित है कि भगवान शिव ने क्रोध में आकर अपने पुत्र गणेश का सिर धड़ से काट दिया था। जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने हाथी के बच्चे का सिर लगाकर पुनः जीवित कर दिया था।

मंदिर में होती है श्री गणेश के बाल रूप की पूजा:

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इस घटना के बाद से श्री गणेश की पहचान उनकी सूंड बन गयी थी। इसी वजह से आज देश में भगवान श्री गणेश की जितने भी मंदिर हैं, सभी में वह अपनी सूंड के साथ विराजमान हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को श्री गणेश के एक ऐसे मंदिर के बारे में भी पता है, जहाँ उनकी पूजा बिना सूंड के होती है। जी हाँ इस मंदिर में श्री गणेश की पूजा बाल रूप में की जाती है। इसी वजह से इस मंदिर में उनकी पूजा बिना सूंड के होती है

गढ़ गणेश नाम से जाना जाता है मंदिर:

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आपकी जानकारी के लिए बता दें श्री गणेश का यह अनोखा मंदिर राजस्थान में स्थित है, जो गढ़ गणेश के नाम से प्रसिद्ध है। श्री गणेश का यह मंदिर जयपुर की उत्तर दिशा में अरावली की ऊँची पहाड़ी पर मुकुट की तरह स्थित है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को लगभग 500 मीटर की ऊँची चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। मंदिर इतनी ऊँचाई पर बसा हुआ है कि यहाँ से जयपुर की भव्यता देखते ही बनती है। यहाँ से जयपुर शहर बहुत ही ख़ूबसूरत दिखाई देता है।

मंदिर की तलहटी में हुआ था अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन:

भारत

इस मंदिर की प्रतिमा की तस्वीर लेना मना है। इस मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसकी तलहटी में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हुआ था। गणेश चतुर्थी के दूसरे दिन यहाँ एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इतिहास पर नज़र डालने पर पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। इन्होंने ही अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया था। उसी समय मंदिर की स्थापना तांत्रिक विधि से की गयी थी।

चंद्र महल की ऊपरी मंज़िल से दर्शन होते हैं श्री गणेश के:

उस समय राज परिवार के सदस्य जिस महल में रहते थे, उसे चंद्र महल के नाम से जाना जाता है। यह सिटी पैलेस का हिस्सा है। इस मंदिर का निर्माण इस तरह से करवाया गया है कि चंद्र महल की ऊपरी मंज़िल से इस मंदिर में स्थापित श्री गणेश की प्रतिमा के दर्शन होते हैं। कहा जाता है कि महाराजा गोविंद देव जी गढ़ गणेश जी के दर्शन करने के बाद ही अपने दिन की शुरुआत करते थे। मंदिर में दो बड़े-बड़े मूषक भी हैं, जिनके कान में मन्नत माँगने से मन्नत पूरी हो जाती है।


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