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आधार है बड़े काम की चीज़, जानें कब आया इसका आइडिया एवं कब और क्या हुआ बवाल

आधार को हर मर्ज़ बताने का समय हुआ ख़त्म

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आधार कार्ड को लेकर देश में काफ़ी समय से विवाद चल रहा था। एक तरफ़ केंद्र सरकार हर चीज़ के लिए आधार को अनिवार्य कर रही थी, वहीं विपक्ष सहित कई लोग इसका विरोध कर रहे थे। यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेजों में भी आधार को अनिवार्य कर दिया गया था। इसको लेकर देश में जमकर विवाद मचा। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने काफ़ी सोच-विचार के बाद आज इसपर अपना फ़ैसला सुना ही दिया। बता दें सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से काफ़ी लोगों को राहत मिली है।

 

आधार को हर मर्ज़ बताने का समय ख़त्म:

Aadhaar 'breach': Everything you need to know

आपकी जानकारी के लिए बता दें आधार कार्ड पर मचे बवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला लोगों के लिए काफ़ी ख़ुशी लेकर आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि मोबाइल कनेक्शन या बैंक खाते के लिए अब कम्पनियाँ आपके ऊपर आधार देने का दबाव नहीं बना सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आधार को ज़रूरी बताया है, लेकिन अब उसका दायरा तय कर दिया है। अब आधार को हर मर्ज़ बताने का समय ख़त्म हो गया है। क्या आप जानते हैं कि आधार की शुरुआत कब हुई थी और इसको लेकर कब और क्या विवाद हुआ था। आइए जानते हैं।

 

आधार की शुरुआत और इसको लेकर हुए विवाद:

*- जनवरी 2009 में योजना आयोग ने यूआईडीएआई को अधिसूचित किया।

*- 2010-2011 में भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक 2010 की शुरुआत हुई।

*- नवम्बर 2012 में सेवानिवृत्त न्यायधीश के एस पुट्टास्वामी और अन्य लोगों ने आधार की वैद्यता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की।

*- नवम्बर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों को प्रतिवादी बनाया।

*- मार्च 2016 में आधार विधेयक 2016 को लोकसभा में पेश किया गया। बाद में यह विधेयक धन विधेयक के तौर पर पारित हुआ।

*- मई 2017 में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में आधार विधेयक को धन विधेयक के तौर पर मानें जानें के केंद्र के निर्णय को चुनौती दी।

*- 24 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यों वाली पीठ ने फ़ैसला दिया कि निजता का अधिकार जनता का मूलभूत अधिकार है।

*- 15 दिसम्बर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न सेवाओं और कल्याण योजनाओं को आधार से आवश्यक रूप से जोड़ने के लिए 31 मार्च 2018 तक का समय दिया।

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*- 17 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यों वाली पीठ ने आधार मामले की सुनवाई शुरू की।

*- 25 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से कहा कि अपने आदेश में दस दिनों के अंदर संशोधन करे, जिसमें राज्य की निचली अदालतों में आरोपी को ज़मानत पर रिहा करने के लिए आधार कार्ड की प्रति को स्वीकार करना अनिवार्य बना दिया था।

*- 19 फ़रवरी को दिल्ली भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने चुनाव आयोग को निर्देश देने की माँग की कि आधार आधारित चुनाव प्रक्रिया शुरू करने के लिए उचित क़दम उठाया जाए।

*- 21 फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार योजना के तहत नागरिकों का बायोमैट्रिक ब्यौरा बिना किसी क़ानून के एकत्रित किए जानें सम्बंधित कमी को क़ानून लाकर ठीक किया जा सकता है।

*- 7 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अखिल भारतीय परीक्षाओं में छात्रों के पंजीकरण के लिए आधार नम्बर अनिवार्य नहीं है।

*- 13 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आधार योजनाओं को जोड़ने के लिए समय सीमा 31 मार्च से अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दी।

*- 22 मार्च को यूआईडीएआई के सीईओ ने कहा कि आधार इंक्रिप्शन को तोड़ने में दुनिया के सबसे तेज़ कम्प्यूटर को भी ब्रह्मांड के जीवनकाल से ज़्यादा का समय लग जाएगा।

*- 28 मार्च को सामाजिक कार्यकर्ता रेशमा प्रसाद ने केंद्र को निर्देश देने की माँग की कि किन्नरों के लिए आधार कार्ड की लिंग की श्रेणी में अलग से तीसरे लिंग का प्रावधान किया जाए।

*- 3 अप्रैल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि आधार क़ानून उचित, निष्पक्ष और तर्कसंगत है।

*- 17 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई की आधार आँकड़ों के दुरुपयोग का ख़तरा है।

*- 25 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने आधार को मोबाइल नम्बर से आवश्यक रूप से जोड़े जानें पर सवाल उठाए।

*- 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिक वैद्यता को बरक़रार रखा, लेकिन कुछ प्रावधानों को हटा दिया। अब से आधार बैंक खातों, मोबाइल फ़ोन और स्कूल नामांकन से जोड़ा जाना ज़रूरी नहीं है।


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