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जानें ख़तरनाक NSG कमांडोज़ के बारे में, जो अब होंगे कश्मीर में तैनात

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एनएसजी कमांडोज़ की ट्रेनिंग कितनी कठिन होती है, इसको कुछ तथ्यों से समझा जा सकता है। किसी भी चुने हुए रंगरुट को एनएसजी कमांडो बनने से पहले नब्बे दिन की विशेष ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी करनी होती है। जिसकी शुरुआत में 18 मिनट के भीतर 26 करतब करने होते हैं और 780 मीटर की बाधाओं को पार करना होता है। अगर चुने गये रंगरुट शुरुआत में यह सारा कोर्स बीस से पच्चीस मिनट के भीतर पूरा नहीं करते, तो उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है। जबकि ट्रेनिंग के बाद इन्हें अधिक से अधिक 18 मिनट के भीतर ये तमाम गतिविधियां निपटानी होती हैं।

अगर किसी कमांडो को ए श्रेणी हासिल करनी है तो उसे यह पूरा कोर्स नौ मिनट के भीतर पूरा करके दिखाना होता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस प्रारंभिक कोर्स में जो बाधाएं होती हैं, वे सब एक जैसी नहीं होतीं। इन बाधाओं में कोई तिरछी होती है तो कोई सीधी। कोई ऊंची होती है तो कोई जमीन से सटी हुई। अलग-अलग तरह की 780 मीटर की इस बाधा को एनएसजी के ट्रेनिंग रंगरूट को अधिकतम 25 मिनट के भीतर और अच्छे कमांडोज़ में शुमार होने के लिए 9 मिनट के भीतर पूरी करनी होती है।

एनएसजी ,national security guard NSG
किसी भी चुने गये कमांडो को नब्बे दिनों की अनिवार्य ट्रेनिंग के दौरान 50 से 62 हजार जिंदा कारतूसों का अपनी फायर प्रैक्टिस में प्रयोग करना होता है। जबकि किसी सामान्य सैनिक की पूरी जिंदगी में भी इतनी फायर प्रैक्टिस नहीं होती। कई बार तो एक दिन में ही एक रंगरूट को दो से तीन हजार राउंड फायर ककरना होता है।

आम सैनिक जहां फायर प्रैक्टिस के लिए पारंपरिक चांदमारी का इस्तेमाल करते हैं, वहीं एनएसजी कमांडोज की फायर प्रैक्टिस बहुत ही जटिल और बहुत ही उन्नत होती है। कमांडोज को पच्चीस सेकेंड के भीतर 14 अलग-अलग टारगेट हिट करने होते हैं और ये चौदह टारगेट सारे के सारे अलग-अलग तरीके के हो सकते हैं। इन सभी टारगेट को एक साथ हिट करने के लिए कमांडोज को अधिकतम ढाई से तीन सेकेंड का ही समय मिलता है। अगर कोई कमांडो एक प्रयास में दस से कम टारगेट हिट कर पाता है तो उसे उतनी ही बार और ज्यादा फायर प्रैक्टिस करनी होती है, जब तक वह न्यूनतम टारगेट न हिट कर ले।एनएसजी, national security guard NSG

कमांडोज की मानसिक टेनिंग भी बेहद सख्त होती है। उनमें कूट-कूट कर देशभक्ति का जज्बा भरा जाता है। अपने कर्तव्य के प्रति ऊंचे मानदंड रखने की लगन भरी जाती है। दुश्मन पर हर स्थिति में विजय प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा भरी जाती है और अंत में अपने कर्तव्य के प्रति हर हाल में ईमानदार बने रहने की मानसिक ट्रेनिंग दी जाती है। इस दौरान इन कमांडोज को बाहरी दुनिया से आमतौर पर बिल्कुल काट कर रखा जाता है। न उन्हें अपने घर से संपर्क रखने की इजाज़त होती है और न ही उन सैन्य संगठनों से, जहां से वे आये होते हैं।

कैसे होता है चयन?

एनएसजी का गठन भारत की विभिन्न फोर्सेज से विशिष्ट जवानों को छांटकर किया जाता है। एनएसजी में 53 प्रतिशत कमांडो सेना से आते हैं, जबकि 47 प्रतिशत कमांडो चार पैरा मिलिट्री फोर्सेज- सीआरपीएफ, आईटीबीपी, रैपिड एक्शन फोर्स और बीएसएफ से आते हैं। इन कमांडोज की अधिकतम कार्यसेवा पांच साल तक होती है। पांच साल भी सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत को ही रखा जाता है, शेष को तीन साल के बाद ही उनकी मूल सेनाओं में वापस भेज दिया जाता है।

एनएसजी की सबसे बड़ी ताकत है, इसका गहन प्रशिक्षण है। किसी साधारण सैनिक को अपनी बीस साल की पूरी सर्विस में जितनी टेनिंग से नहीं गुजरना पड़ता है, उससे कई गुना ज्यादा किसी राष्टीय सुरक्षा गार्ड के कमांडो को अपनी तीन साल की सर्विस के दौरान ही गुजरना पड़ता है। एनएसजी में भी दो हिस्से हैं, पहला एसएजी यानी स्पेशल एक्शन ग्रुप और दूसरा एसआरजी यानी स्पेशल रेंजर्स ग्रुप।

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एसएजी में मूलतः भारतीय सेनाओं से चुने गये सैनिकों को रखा जाता है और एसआरजी में भारत के विभिन्न अर्द्घ सैन्य बलों से चुने गये सैनिकों को लिया जाता है। दोनों के काम में भी थोड़ा-बहुत फर्क है। हालांकि दोनों के लिए ट्रेनिंग एक ही होती है और मौका पड़ने पर दोनों एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर काम करते हैं। लेकिन आमतौर पर एसएजी को उन तमाम खतरनाक मुहिमों पर भेजा जाता है, जिसमें मौके पर ही किसी कार्रवाई को अंजाम देना होता है। इस तरह की कार्रवाइयों के केन्द्र में आमतौर पर आतंकवादी वारदातें होती हैं।

दूसरी तरफ एसआरजी की कार्रवाइयों में वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा को रखा जाता है। इस समय देश में कई दर्जन अति महत्वपूर्ण लोग हैं, जिनकी सुरक्षा में एनएसजी के कमांडो लगाये गये हैं। एनएसजी में शामिल होने वाले निरीक्षक स्तर के अधिकारियों की अधिकतम उम्र 35 साल होती है, जबकि आमतौर पर कार्रवाई करने वाले कमांडोज की उम्र इससे काफी कम होती है। एनएसजी का हेड र्क्वार्टर दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर हरियाणा के मानेसर में |

N.S.G  का आरंभ:

एनएसजी, national security guard NSG1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों की कैद से मुक्त कराने के लिए जब भारतीय सेना ने कार्रवाई की, तो वह कार्रवाई सफल तो रही, लेकिन इस कार्रवाई में काफी सारे सैनिक शहीद हुए।  इससे भी बड़ी बात यह हुई कि अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर को भारी नुकसान हुआ। इस ऑपरेशन के बाद ही यह तय किया गया कि देश में एक ऐसी फोर्स होनी चाहिए, जो खतरनाक और संवेदनशील मौकों पर सफाई से कार्रवाई कर सके। चूंकि पिछली सदी के अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, इसलिए तात्कालिक रूप से निपटने के लिए इसे बनाया गया।

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने श्री गांधी को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इजरायल में मौजूद विशिष्ट कमांडो फोर्स की तर्ज पर भारत में भी कमांडो फोर्स के गठन की बात कही गयी थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर 1984 के अंत में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के गठन की घोषणा कर दी। हालांकि तथ्यात्मक रूप से इसका गठन एनएसजी एक्ट-1985 के तहत किया गया। आमतौर पर ये फोर्स आपको विशेष नेताओं की सुरक्षा में दिखाई देती है लेकिन इनकी सही जगह तो दुर्दांत आंतकवादियों से निपटने एवं आम नागरिकों की सुरक्षा प्रदान करने जिनमें, अमरनाथ यात्रा जैसी संवेदनशील जगहों पर हैं। जहां इन्हें अब जाकर तैनात किया गया हैं। इस इस्पेशल फोर्स के बनाने के मूल उद्देश्य का अब जाकर कहीं न कहीं अहसास हो रहा |

एनएसजी कमांडो के बारे में और जानें

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