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जिनसे ख़ौफ़ खाती थी मुगल सेना, जानिए ऐसे वीर गुरू हरगोबिंद के बारे में कुछ रोचक तथ्य

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14 जून,1595 को बडाली (अमृतसर) भारत में जन्में सिखों के छठे गुरू हरगोबिंद सिंह महान क्रांतिकारी थे।ये अपने पिता गुरू अर्जन देव जी क बाद सिख धर्म के छठे गुरु बने। जानकारी के लिए बता दें इनके पिता सिख धर्म में पांचवे गुरू थे।  जब सिख धर्म निष्क्रिय हो चुका था तब इन्होंने तख्त संभाला। ये उनकी कौशल और वीरता थी कि इन्होंने चार बार जहाँगीर की सेना को मात दी। ये इतने महान योद्धा थे, जिनसे मुगल सेना ख़ौफ़ खाती थी।हरगोबिंद
इतिहास के मुताबिक जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था। उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा। किंवदंतियों के मुताबिक गुरू हरगोबिंद को कैद किए जाने के बाद से जहांगीर को स्वप्न में किसी फकीर से गुरू जी को आजाद करने का हुक्म मिलने लगा। जहांगीर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा। इसी दौरान मुगल शहंशाहों के किसी करीबी फ़कीर ने उसे मशविरा दिया कि वह गुरू हरगोबिंद साहब को तत्काल रिहा कर दे। लेकिन गुरू अड़ गए कि उनके साथ 52 राजाओं को भी रिहा किया जाए। लिहाजा उनके साथ 52 कैदियों को भी छोड़ दिया गया।
52 कलियों के अंगरखे को पकड़ बाहर आए राजा
जहांगीर के मुताबिक उन 52 राजाओं को रिहा करना मुगल साम्राज्य के लिए ख़तरनाक था, लिहाजा उसने कूटनीतिक आदेश दिया। जहांगीर का हुक्म था कि जितने राजा गुरू हरगोबिंद साहब का दामन थाम कर बाहर आ सकेंगे, वो रिहा कर दिए जाएंगे। सिख गुरू चाहते थे कि उनके साथ कैद सभी राजा रिहा हों, लिहाजा गुरू जी के भाई जेठा ने युक्ति सोची। जेल से रिहा होने पर नया कपड़ा पहनने के नाम पर 52 कलियों का अंगरखा सिलवाया गया। गुरू जी ने उस अंगरखे को पहना, और हर कली के छोर को 52 राजाओं ने थाम लिया। इस तरह सब राजा रिहा हो गए।
know-some-interesting-fact-about-hargobind-singhगुरू जी के इस कारनामे की वजह से उन्हें दाता बंदी छोड़ कहा गया। बाद में उनकी इस दयानतदारी की याद बनाए रखने के लिए ग्वालियर किले पर उस स्थान पर एक गुरुद्वारा स्थापित कराया गया, जहां गुरू हरगोबिंद साहब 52 राजाओं के साथ कैद रहे थे। गुरू जी के नाम पर इसका नाम भी गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब रखा गया। इस कालावधि में उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला बनवाया तथा उसका नाम लौहगढ़ रखा। दिनोंदिन सिखों की मजबूत होती स्थिति को ख़तरा मानकर मुगल बादशाह जहांगीर ने उनको ग्वालियर में कैद कर लिया। गुरु हरगोबिंद 12 वर्षों तक कैद में रहे, इस दौरान उनके प्रति सिखों की आस्था और अधिक मजबूत होती गई।
हरगोबिंद ने मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित अनुयायियों में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। मुगलों के विरोध में गुरु हरगोबिंद सिंह ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की किलेबंदी की। उन्होंने ‘अकाल बुंगे’ की स्थापना की। ‘बुंगे’ का अर्थ होता है एक बड़ा भवन जिसके ऊपर गुंबद हो। उन्होंने अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन, स्वर्ण मंदिर के सम्मुख) का निर्माण किया। इसी भवन में अकालियों की गुप्त गोष्ठियां होने लगीं। इनमें जो निर्णय होते थे उन्हें ‘गुरुमतां’ अर्थात् ‘गुरु का आदेश’ नाम दिया गया।

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