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MP की राजनीति तय करेगा यह इलाक़ा, जो यहाँ जीतेगा उसी के बनेगी सरकार

इलाक़े में है आरएसएस कैडरों की अच्छी पकड़

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इसी साल के अंत में पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा और कांग्रेस के साथ ही देश की अन्य पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है। भाजपा और कांग्रेस तो पूरी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतर भी गए हैं। इस बार मध्य प्रदेश की कमान किसके हाथ में होगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन दोनों ही पार्टियाँ अपनी-अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रही हैं। अगर प्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल की बात करें तो इसे जीतने के लिए सभी पार्टियाँ अलग रणनीति के साथ उतरने की तैयारी में हैं।

 

45 सीटों पर अकेले था भाजपा का क़ब्ज़ा:

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि यह अंचल भाजपा का गढ़ है और पिछले 15 सालों से इसी अंचल की वजह से भाजपा सत्ता में बनी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी पार्टी मालवा-निमाड़ क्षेत्र में जीत हासिल करती है, उसी पार्टी की मध्य प्रदेश में सरकार बनती है। आँकड़ों पर अगर नज़र डालें तो मालवा-निमाड़ में कुल 66 सीटें आती हैं। 2013 के चुनाव में मालवा की 50 सीटों में से 45 पर अकेले भाजपा का क़ब्ज़ा था। जबकि कांग्रेस को यहाँ केवल 4 सीटें ही मिली थी।केवल थांदला सीट पर निर्दलीय विधायक ने जीत हासिल की थी।

 

इलाक़े में है आरएसएस कैडरों की अच्छी पकड़:

निमाड़ से भी 2013 के चुनाव में छप्पर फाड़ के भाजपा को वोट मिले थे। निमाड़ की 16 में से 11 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, वहीं कांग्रेस को केवल 5 सीटें ही मिली थी। राजनीति के जानकारों की मानें तो मालवा-निमाड़ अंचल क्षेत्र में भाजपा की जीत की वजह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। यहाँ आरएसएस के कैडरों की पूरे इलाक़े में अच्छी पकड़ है। संघ के कई बड़े अधिकारी भी इसी इलाक़े से सम्बंध रखते हैं। संघ में दूसरे स्थान पर सुरेश भैय्याजी जोशी भी मालवा के हैं।

 

किसानों की नाराज़गी का फ़ायदा मिल सकता है कांग्रेस को:

आपकी जानकारी के लिए बता दें भाजपा के कई दिग्गज नेता भी इसी अंचल से आते हैं। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे, पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा, स्वर्गीय विरेंद्र सखलेचा, कैलाश जोशी, सत्यनारायण जटिया, नंदकुमार सिंह चौहान और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन एवं केंद्रीय मंत्री थवरचंद गहलोत भी यहीं से हैं। यही वजह है कि इस बार कांग्रेस की पूरी कोशिश होगी कि वह मालवा-निमाड़ में कोई जादू चला पाए। कांग्रेस को यह पता है कि किसान आंदोलन ने बाद भाजपा के ख़िलाफ़ लोगों में ख़ूब नाराज़गी है। इसका फ़ायदा कांग्रेस को इस चुनाव में आसानी से मिल सकता है।

 

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पिछले चुनाव में होना पड़ा क्षेत्र को उपेक्षा का शिकार:

देखा जाए तो पूरे प्रदेश में किसान आंदोलन का सबसे ज़्यादा प्रभाव था तो वह मालवा-निमाड़ में ही था। यहाँ के मन्दसौर में हुए गोलीकांड में किसानों की मौत हो गयी थी। उस समय किसानों के आक्रोश को कांग्रेस भुनाने में सफल भी हुई थी। इसका असर राहुल गांधी की 7 जून को हुई महासभा में देखने को मिला था। बता दें अगर भाजपा की बात करें तो शिवराज सरकार पर उनकी ही पार्टी के लोग आरोप लगाते आए हैं कि मालवा-निमाड़ को पिछले चुनाव से ही उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। इंदौर, धार, शाजापुर, झाबुआ, रतलाम, मंदसौर, नीमच और आलीराजपुर ऐसे जिले हैं, जहाँ से इस बार की शिवराज सरकार में कोई मंत्री नहीं बना।

 

अबकी बार आदिवासी सरकार:

कांग्रेस के और भाजपा के साथ ही मालवा-निमाड़ में एक और दल सक्रिय है जो इस बार की राजनीति समीकरण बिगाड़ सकता है। इस समय क्षेत्र में इसकी चर्चा ज़ोरों पर है। इस पार्टी का नाम है जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस)। जानकारी के अनुसार यह पार्टी जनजातीय समुदाय के दबदबे वाली 80 सीटों पर दम-ख़म आज़मानें की तैयारी में है। इसके साथ ही यह संगठन कुछ अनारक्षित विधानसभा क्षेत्रों में ग़ैर आदिवासियों को समर्थन देने पर भी विचार कर रहा है। मोदी की तर्ज़ पर ही ‘अबकी बार आदिवासी सरकार’ का नारा देने वाली जयस अभी तक एक राजनीतिक पार्टी के रूप में चुनाव आयोग में पंजीकृत नहीं है, लेकिन उसकी 80 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार उतारकर उन्हें समर्थन देने की तैयारी है।

 

कौन मार पाता है मालवा-निमाड़ में बाज़ी:

कहा जा रहा है कि अगर जयस आदिवासी वोट पानें में कामयाब हो जाता है तो इसका फ़ायदा कांग्रेस को सबसे ज़्यादा मिल सकता है। अभी मालवा-निमाड़ की ज़्यादातर आदिवासी सीटों पर भाजपा का ही क़ब्ज़ा है। ऐसे में इस बार का चुनाव देखना बहुत ही दिलचस्प होगा कि मध्य प्रदेश की राजनीति तय करने वाले इस क्षेत्र में आख़िर कौन बाज़ी मार पाता है।


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