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मणिकर्णिका फिल्म समीक्षा: जानें क्यों देखें फिल्म और क्या है ख़ासियत

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लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी(काशी) ज़िले के भदैनी नामक शहर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव क सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ साल की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

कहानी:

‘खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी’ वाकई सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों को कंगना रनौत ने फिल्मी पर्दे पर ही नहीं बल्कि असल जिंदगी में भी सार्थक किया। अनगिनत विवादों के बावजूद कंगना ने फिल्म को पूरा करने के जुनून को वैसे ही निभाया, जैसे ‘मणिकर्णिका’ से झांसी की रानी बनने के बाद लक्ष्मीबाई ने आजादी पाने के जुनून को मंजिल तक पहुंचाया। अमिताभ बच्चन के वॉइस ओवर के साथ कहानी की शुरुआत होती है। अठारह सौ अट्ठाईस के दशक में मनु उर्फ मणिकर्णिका की हीरोइक एंट्री होती है, जहां वह अपनी अचूक तीरअंदाजी से खूंखार शेर को बेहोश कर देती है।

मणिकर्णिका

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झाँसी की रानी पर केंद्रित है कहानी:

बिठूर में पैदा हुई पेशवा (सुरेश ओबेरॉय) की इस दत्तक पुत्री को शौर्य, साहस और सुंदरता जन्मजात मिली थी, इसलिए राजगुरु (कुलभूषण खरबंदा) की निगाह उस पर पड़ती है और अपनी इन्हीं खूबियों के कारण वह झांसी के राजा गंगाधर राव नावलकर की रानी बनती है। इतिहास रानी लक्ष्मीबाई द्वारा अंग्रेजों के साथ लड़ी जाने वाली शौर्यगाथा से रंगा पड़ा है। कहानी भी उसी शौर्यगाथा को दर्शाती है, मगर कहानी में गौस बाबा (डैनी डेंगजोंग्पा) की स्वामिभक्ति, झलकरीबाई की बहादुरी और स्वामिभक्ति, तात्या टोपे (अतुल कुलकर्णी) का अदम्य साथ और साहस जैसे दिलचस्प ट्रैक हैं। झांसी की रानी को अंग्रेजों के सामने सिर झुकाना कभी गवारा ही नहीं था। वह झांसी को वारिस देने पर खुश है कि अब उसके अधिकार को अंग्रेज बुरी नियत से हड़प नहीं पाएंगे, मगर घर का ही भेदी सदाशिव (मोहम्मद जीशान अयूब) षड्यंत्र रचकर पहले लक्ष्मीबाई की गोद उजाड़ता है और फिर अंग्रेजों के जरिए गद्दी छीन लेता है। कहानी पूरी तरह से झांसी की रानी पर ही केंद्रित है।

इंटरवल तक धीमी गति से बढ़ती है फिल्म:

1857 के राष्ट्रीय आंदोलन को उतनी गहराई से नहीं दर्शाया गया है। अंग्रेजों के हर वार को नाकाम करते हुए लक्ष्मीबाई जब ग्वालियर पहुंचती है, तो तब तक आजादी का बिगुल देशभर में बज चुका है क्लाइमेक्स में अंग्रेज सर ह्यूरोज की सेना के साथ लक्ष्मीबाई का युद्ध और वीरतापूर्ण ढंग से प्राणों की आहुति देनेवाला अंदाज रोंगटे खड़े कर देता है। निर्देशन की बात करें, तो सभी जानते है कि इसकी जिम्मेदारी राधा कृष्ण, जगरलामुदी के अलावा मुख्य रूप से कंगना ने निभाई है और इसमें कोई शक नहीं कि इस भार को उन्होंने अपने नाजुक कंधों पर बखूबी उठाया है। इंटरवल तक फिल्म धीमी गति से आगे बढ़ती है। अलग-अलग किरदारों को स्टैब्लिश करने की कोशिश में फिल्म खिंच जाती है, मगर सेकंड हाफ में जैसे ही स्वंत्रता संग्राम का बिगुल बजता है, फिल्म का ऐक्शन, टर्न ऐंड ट्विस्ट, रणभूमि की ज्वाला माहौल को रोमांचक बना देती है।

निर्देशक के रूप में कंगना गणतंत्र दिवस के मौके पर देशभक्ति का अलख जगाने में सफल रही हैं। फिल्म में अंग्रेज सरकार और कंपनी के पहलू को सशक्त बनाया जा सकता था। फिल्म में बेहतर स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल होता, तो रोमांच और बढ़ जाता। अब तक ऐतिहासिक फिल्मों को हमने भंसाली और आशुतोष गोवारिकर के नजरिए से देखा है, मगर कंगना के नजरिए में खूबसूरती और बहादुरी दोनों झलकती है। कई दृश्य और संवाद ताली पीटने पर मजबूर कर देते हैं। मातृभूमि के लिए मर-मिटनेवाले प्रसून जोशी के संवाद जोश भर देते हैं।

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