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भवानदा और पलायन

भवानदा किसी उधेड़ बुन में उलझे हुए थे कि अचानक उनके सामने उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट आ गयी

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भवानदा और पलायन

भवानदा किसी उधेड़ बुन में उलझे हुए थे कि अचानक उनके सामने उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट आ गयी, जिसमें लिखा था अब प्रतिदिन 33 लोग पहाड़ छोड़ रहे हैं। फिर क्या था, लगे गरियाने नेताओं और तल्ली बाखली के प्रधान को ‘’खा गए सब अपनी देवभूमि की माटी को भी’’ नहीं छोड़ेंगे गंगनाथ इनको। अभी पिछले साल की ही बात हुई जब हमारी चाची पेड़ से गिर गई ठैरी, तब गांव में एक भी ऐसा लड़का नहीं ठैरा जो टाइम पर 108 को बुलाये या कहीं किसी अस्पताल पहुंचा दे, मर गई बेचारी। ऐसे ही पूरे उत्तराखंड के लगभग 1668 गांव हैं जहां बदहाल स्थिति हैं, कई जगह तो सिर्फ 2-4 परिवार हैं जिनमें बृद्ध दम्पत्ति रहते हैं।

 

migration in uttarakhand

 

दोष किसे दूँ मैं खुद भगौड़ा हूँ, मैं क्यों वहां से पलायन कर गया?
हर कोई वाकिफ है मगर कोई उस वास्तविकता को स्वीकरना नहीं चाहता, आज भवानदा यहीं सब सोचकर माथा पटकने लग जाते हैं। गांव की खेती पर बंदर और सूअर अपना कब्जा कर बैठे हैं।
करें तो क्या करें?
जाएँ तो कहाँ जाएँ?
बच्चों का एक प्राइमरी स्कूल है वहां मास्साब नहीं आते !
सुना है बिजली पिछले 3 महीने से नहीं आ रही।

 

migration in uttarakhand

 

काम-धंधे के चक्कर में शहर आया तो बच्चों को भी यहीं ले आया, मां-बाप आना नहीं चाहते इधर।
ये सवाल ज्वार-भाटा की तरह हर उत्तराखंडी के जेहन में उठते रहते हैं।
सरकारें आयी-गई मगर मेरा पहाड़ हर बार और अधिक छलनी हुआ, भवानदा हर बार रोया, 50-60% लोगों ने सिर्फ और सिर्फ आजीविका के लिए अपना घरबार छोड़ा जबकि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए 80% से अधिक लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर हैं।
किसने किया मजबूर?
यक्षप्रश्न है, मगर कोई अनभिज्ञ नहीं।
मन खिन्न था, पहाड़ को छोड़ने की टीस थी, आखिर क्या करता……….?

 

migration in uttarakhand

 

भवानदा को ताज्जुब हो रहा है कि आजकल तो काफल और हिंसालु भी फेसबुक-व्हाट्सप्प पर आसानी से उपलब्ध हैं तो फिर किसको पडी पहाड़ जाकर उनसे मिलकर बचपन की कुछ बातें साझा करने की। आज उत्तराखंड में 734 पूरी तरह से खाली हो चुके हैं यहाँ सिवाय सन्नाटे के कोई नहीं रहता तो कहाँ किल्मोड़ा होता होगा?
पहाड़ किसी के रहमो-करम का मोहताज नहीं मगर पलायन के बावजूद उसका अनायास दोहन जारी है।
आज भवानदा पहाड़ तो जाना चाहता है मगर उसकी जमीन और घर पर किसी और का कब्जा है, सुना है कि अमीन और पटवारी ने कुछ ले-देकर भटनागर को दे दिया।
भगवान जाने भटनागर है कि……

 

migration in uttarakhand

 

पिछले दस सालों में लगभग चार लाख लोगों ने अपना गांव छोड़ दिया है जिसमें 23-32 साल के युवा शामिल हैं।
अभी मेरे लिखने तक किसी और भाई ने गांव छूने का फैसला कर लिया होगा जो एक कटुसत्य है जिसे न चाहते हुए मुझे-आपको स्वीकार करना होगा, राज्य में पलायन आयोग भी बना है मगर नाममात्र का जो सिर्फ और सिर्फ सर्वे करने तक सीमित है वो भी वातानुकूलित कमरों में बैठकर।
खैर भवानदा पहाड़ आने को आतुर तो है……

बीएस गौनिया – हल्द्वानी (उत्तराखंड) 


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