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इस नवरात्रि अपनी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ज़रूर दर्शन करें नैना देवी का, दुःख हो जाएँगे दूर

विष्णु जी ने चक्र से 52 भागो में बाँट दिया सती का शरीर

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भारत एक धार्मिक देश है। भारत में हर जगह आपको देवी-देवताओं के मंदिर देखने को मिल जाएँगे। कई मंदिर तो इतने प्राचीन हैं कि उन मंदिरों के बारे में कई तरह की कहानियाँ और मान्यताएँ भी प्रचलित हैं। हिमाचल प्रदेश को भी देवी-देवताओं के मंदिरों के लिए जाना जाता है। यहाँ पर देवी-देवताओं के कई ऐसे मंदिर हैं, जिनके बारे में जानकर आप हैरान हो जाएँगे। कई मंदिरों के रहस्यों का आजतक कोई पता नहीं लगा पाया है। ऐसा ही एक मंदिर है हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले से 1177 मीटर की ऊँचाई पर स्थिति नैना देवी का मंदिर।

 

बिना बुलाए ही देवी सती पहुँच गयी यज्ञ में:

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हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार पूरे भारतवर्ष में देवी सती के 51 शक्तिपीठ हैं। इन्ही जगहों पर देवी सती के कोई ना कोई अंग गिरे थे। जिस वजह से इन जगहों पर शक्तिपीठ बन गए। जिन जगहों पर देवी सती के जो अंग गिरे थे, उसी नाम के शक्तिपीठ बने हुए हैं। आपको बता दें मान्यता के अनुसार भगवान शिव के ससुर राजा दक्ष ने अपने यहाँ यज्ञ का आयोजन किया और उसमें भगवान शिव और अपनी बेटी सती को नहीं बुलाया। राजा दक्ष भगवान शिव को अपने बराबर नहीं समझते थे। यह बात देवी सती को बुरी लगी और वह बिना बुलाए ही यज्ञ में पहुँच गयीं।

 

विष्णु जी ने चक्र से 52 भागो में बाँट दिया सती का शरीर:

जब वह अपने पिता के यज्ञ समारोह में पहुँची तो उनके पिता ने सबसे सामने शिव की ख़ूब निंदा की। अपने पति शिव की निंदा देवी सती से सहन नहीं हुई और वह उसी हवन कुंड में कूद गईं। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वह देवी सती के शव को हवन कुंड से निकालकर तांडव करने लगे। इस वजह से पूरे ब्रह्मांड में हाहाकर मच गया। ब्रह्मांड को इस बड़ी मुसीबत से बचाने के लिए भगवान शिव ने देवी सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागों में बाँट दिया। माता सती का जो अंग जिस स्थान पर गिरा, वहाँ पर उसी नाम का शक्तिपीठ बन गया। ऐसा कहा जाता है कि नैना देवी में माता सती के नैन (आँख) गिरी थे।

 

सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले की हो जाती है हर इच्छा पूरी:

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साल के दोनों चैत्र और शारदीय नवरात्र में नैना देवी के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। आपको बता दें नैना देवी के मंदिर के मुख्य द्वार के दाईं तरफ़ भगवान श्री गणेश और हनुमान जी विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में तीन मुख्य प्रतिमाएँ रखी गयी हैं। दायीं तरफ़ माता काली, बीच में नैना देवी और बायीं तरफ़ भगवान श्री गणेश स्थापित हैं। ऐसा कहा जाता है कि नैना देवी के मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से माता से प्रार्थना करता है, उसकी हर इच्छा पूरी हो जाती है। व्यक्ति का जीवन ख़ुशियों से भर जाता है।

 

 

गोबिंद सिंह जी ने की थी नैना देवी की तपस्या:

बता दें त्योहार और मेलों के दौरान मंदिर में जानें वौर वापस आने के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए गए हैं। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि दर्शन करने वाले लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े। बेस कैम्प से लगभग डेढ़ घंटे में मंदिर की दूरी तय की जा सकती है। माता के भक्त माता के नाम का जयकारा लगाते हुए पैदल पहाड़ी पर चढ़ते हैं। यह मंदिर पूरे देश में इतना प्रसिद्ध है कि सालभर यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्तों की संख्या यहाँ नवरात्रि के समय बहुत बढ़ जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि सिक्खों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी ने यहाँ माता नैना देवी की तपस्या की थी।

 

माता के आशीर्वाद से किया था मुग़लों को पराजित:

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गोबिंद सिंह जी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ भवानी के स्वयं प्रकट होकर गुरुजी को प्रसाद के रूप में तलवार भेंट की और गुरुजी को वरदान दिया था कि तुम्हारी विजय होगी। इसके अलावा माता ने यह भी आशीर्वाद दिया था कि इस धरती पर हमेशा तुम्हारा पंथ चलता रहेगा। माता का आशीर्वाद पानें के बाद गोबिंद सिंह जी ने मुग़लों को पराजित किया था। हवन के बाद जब गुरुजी आनंदपुर साहिब की तरफ़ जाने लगे तो उन्होंने अपने तीर की नोक से ताम्बे की एक प्लेट पर अपने पुरोहित को हुक्मनामा लिखकर दिया, जो आज भी नैना देवी के पंडितों के पास सुरक्षित रखा हुआ है।


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