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उत्तराखंड के इस मंदिर में चढ़ाई जाती है 500 ग्राम की पूड़ी, जानिए मंदिर की ख़ासियत

बागेश्वर जिले में कपकोट ब्लॉक के अंतर्गत एक गाँव है, जिसका नाम है पोथिंग।

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उत्तराखंड को भारत में देवभूमि यानी देवताओं की नगरी के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है, जहाँ आपको हर स्थान पर किसी ना किसी देवी-देवता का मंदिर देखने को मिल जाएगा। बागेश्वर जिले में कपकोट ब्लॉक के अंतर्गत एक गाँव है, जिसका नाम है पोथिंग। यहां पर भी एक ऐसा ही प्रसिद्ध मंदिर है, इस गाँव में हिमालय की पुत्री नंदा की विशेष पूजा की जाती है। इस साल माँ नंदा भगवती के मंदिर में सौंपाती पूजा की गयी। बता दें यह विशेष पूजा लगातार पाँच दिनों तक चलती रहती है। पंचमी के दिन होने वाली पूजा का महत्व बहुत ज़्यादा होता है। इस पूजा में शामिल होने के लिए दूर-दराज़ के लोग आते हैं।

 

रात के समय होती है माँ की विशेष आरती:

इस मंदिर की ख़ासियत यह है कि यहाँ देवी माँ को भोग लगाने के लिए 500 ग्राम की एक-एक पूड़ी बनाई जाती है। पूड़ियों की संख्या सैकड़ों में होती है। ये पूड़ियाँ गेहूँ के आटे से बनाई जाती हैं। इन पूड़ियों को बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में बनाया जाता है। गाँव वाले इन पूड़ियों को अपने सगे-सम्बन्धियों को प्रसाद के रूप में भेजते हैं। चतुर्थी के दिन रातभर जागरण होता है और रात में माता की विशेष आरती होती है। इस दौरान लोग झोड़ा-चांचरी गाकर मनोरंजन करते हैं। यहाँ गढ़वाल और कुमाऊँ का सांस्कृतिक संगम देखने को भी मिलता है।

 

माँ ने रात्रि के समय यहाँ किया था विश्राम:

जनश्रुतियों के अनुसार पहाड़ वाली माता शेरावली की तरह पिंडों में प्रकट होने वाली माता के पोथिंग स्थित भवन में एक चिमटा, नगारा, घंटी एवं धूप प्रज्वलित करने वाली धूपैंण प्रकट हुए थे। भक्ति से ओत-प्रोत साधक को आज भी इनके दर्शन सुलभ हो सकते हैं। कहा जाता है कि हिमालय जाते वक़्त माँ नंदा ने पोथिंग ग्राम में रात्रि विश्राम किया था।

 

माँ को अर्पित किए जाते हैं नए चावल:

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बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम की तरह ही हर साल भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी और अष्टमी की तिथि को ही भव्य आयोजन के साथ खोले जाते हैं। इससे पहले पूर्व रात्रि में भगवती जागरण, डंगरियो में देवी अवतरण आदि अनुष्ठान किया जाता है। जब चैत्र महीने में धान की फ़सल कट रही होती है तो माँ को अर्पित करने के लिए नया चावल प्रस्तुत किया जाता है। पोथिंग में मनाए जानें वाले इस महोत्सव को स्थानीय भाषा में आठों और स्यौपाती कहा जाता है। आठों पूजा अष्टमी और स्यौपाती पूजा पंचमी तक चलती है।

 

विसर्जन के बाद एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं कपाट:

बता दें इस पूजा के दौरान भोग और प्रसाद की सम्पूर्ण सामग्री गाँव के ही लोग मिलकर इकट्ठा करते हैं। पनचक्की से सारा गेहूँ पीसा जाता है और उससे पूड़ियाँ बनाई जाती हैं। हज़ारों की संख्या में जो श्रद्धालु इस महोत्सव में आते हैं, महोत्सव के अंत में प्रसाद के रूप में एक भारी-भरकम पूड़ी लेकर जाते हैं। पूजा के अंत में डिकर सेवाना की पवित्र एवं भावपूर्ण रस्म अदा की जाती है। बाजे-गाजे के साथ डंगरिये नृत्यपूर्वक विविध अलंकरणों से अलंकृत माँ के विग्रह को गोद में लिए हुए भक्त मंडली जयकारे के साथ, पास में बहने वाले जल के स्त्रोत पर जाते हैं और विग्रह विसर्जन की रस्म अदा करते हैं। इस दौरान कई भक्तों की आँखें भर आती हैं। इसके बाद मंदिर के दरवाज़े एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

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