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इच्छा मृत्यु पर बोले चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, हर व्यक्ति को सम्मान से मारने का अधिकार

euthanasia
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काफ़ी समय से यह बात चल रही है कि क्या लोगों की इच्छा के हिसाब से उन्हें मरने की आज़ादी दी जा सकती है। कई बार ऐसा हुआ है कि लोगों ने इच्छा मृत्यु की माँग की है। जब व्यक्ति अपने जीवन से तंग आ जाता है तो वह ऐसी माँग करता है। लेकिन भारतीय क़ानून के हिसाब से ऐसा सम्भव नहीं था। किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति को मारने का अधिकार नहीं है। भले ही वह ख़ुद ही क्यों ना मरना चाहे।

 

बना सकता है व्यक्ति लिविंग विल:

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इच्छा मृत्यु पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि क़ानूनी तौर पर किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या करने का अधिकार नहीं है। यह एक अपराध है, लेकिन सम्मान के साथ मारने का हर व्यक्ति को अधिकार है। आपकी जानकारी के लिए बता दें शनिवार को पुणे में बैलेंसिंग ऑफ़ कोंस्टिट्यूशनल राइट्स के विषय पर आयोजित एक व्याख्यान को सम्बोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने यह बात कही। दीपक मिश्रा ने अपने व्याख्यान में कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी बीमारी से ग्रस्त है जो कभी थी ही नहीं हो सकती है और वह इच्छामृत्यु चाहता है तो वह इसके लिए अपनी लिविंग विल बना सकता है।

 

मरणासन्न व्यक्ति को गाइड लाइन के साथ दी क़ानूनी मान्यता:

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बता दें दीपक मिश्रा ने आगे कहा कि हर व्यक्ति के पास अपना अधिकार है कि वह कब तक अंतिम साँस ले और इसके लिए उसके ऊपर किसी तरह का दबाव भी नहीं होना चाहिए। पुणे में आयोजित इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डणवीस के साथ सुप्रीम कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट के न्यायधीश भी मौजूद थे। इसी साल 9 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छामृत्यु के लिए लिखी गयी वासियत को गाइड लाइंस के साथ क़ानूनी मान्यता दी थी।

 

मरणासन्न स्थिति में पहुँचने पर कैसे किया जाए इलाज:

कोर्ट ने उस समय यह फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह कब तक अपनी आख़िरी साँस ले। कोर्ट ने उस समय कहा था कि लोगों को सम्मान के साथ मरने का पूरा अधिकार है। लिविंग विल एक लिखित दस्तावेज़ होता है, जिसमें कोई मरीज़ पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुँचने या रज़ामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुँचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। पैसिव युथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ़ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

 

मृत्यु जीने की प्रक्रिया का हिस्सा है:

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की पीठ ने पिछले साल 11 अक्टूबर को इस याचिका पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा था। 9 मार्च 2018 को सुनाए गए फ़ैसले के बाद से कोई भी मरणासन्न व्यक्ति लिविंग विल के ज़रिए अग्रिम रूप से बयान जारी कर यह निर्देश दे सकता है कि उसके जीवन को वेंटिलेटर या आर्टिफ़िशियल सपोर्ट सिस्टम पर लगाकर लम्बा नहीं किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जीवन और मृत्यु को अलग नहीं किया जा सकता है। हर क्षण हमारे शरीर में बदलाव होता है। बदलाव एक नियम है। मृत्यु जीने की प्रक्रिया का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने पसिव युथेनेशिया और लिविंग विल को मान्यता देते हुए कहा था कि ये राइट टू लाइफ़ का हिस्सा है।

 

बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को होना चाहिए लिविंग विल बनाने का अधिकार:

आपको बता दें कि एक एनजीओ कॉमन कॉज ने इस मुद्दे पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल कर रखी थी। इसके वक़ील प्रशांत भूषण ने कहा कि गम्भीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को लिविंग विल बनाने का हक़ होना चाहिए। लिविंग विल के माध्यम से व्यक्ति बता सकेगा कि जब वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाए, जहाँ से उसके ठीक होने की उम्मीद ना हो तब उसे ज़बरदस्ती लाइफ़ सपोर्ट पर नहीं रखा जाए। प्रशांत भूषण ने स्पष्ट किया कि वह एक्टिव युथेनेशिया की वकालत नहीं कर रहे हैं, जिसमें लाइलाज मरीज़ को इंजेक्शन देकर मार दिया जाता है। वह पैसिव युथेनेशिया की बात कर रहे हैं, जिसमें कोमा में पड़े लाइलाज व्यक्ति को वेंटिलेटर जैसे लाइफ़ सपोर्ट से निकालकर मारने दिया जाता है।

 

केंद्र सरकार नहीं करती लिविंग विल का समर्थन:

इस सुनवाई के दौरान जब अदालत ने सवाल किया था कि आख़िर यह कैसे तय होगा कि मरीज़ ठीक हो सकता है या नहीं तो इसके जवाब में प्रशांत भूषण ने कहा था कि यह डॉक्टर तय कर सकते हैं। आपको बता दें फ़िलहाल कोई क़ानून ना होने की वजह से मरीज़ को ज़बरदस्ती लाइफ़ सपोर्ट पर रखा जाता है। कोमा में पहुँचा मरीज़ ख़ुद इस स्थिति में नहीं होता है कि वह अपनी इच्छा व्यक्त कर सके। इसलिए उसे पहले ही लिखने का अधिकार होना चाहिए कि जब उसे ठीक होने की उम्मीद ख़त्म हो जाए तो उसके शरीर को यातना ना दी जाए। केंद्र ने पैसिव युथेनेशिया को सही बताया है लेकिन वह लिविंग विल का समर्थन नहीं करती है। यह एक तरह से आत्महत्या जैसा है।

 

 


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