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पुलिया का पागल चौकीदार, कहानी सुदामा प्रसाद प्रेमी !

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कथा की व्यथा | पुलिया का पागल चौकीदार |  कहानी सुदामा प्रसाद प्रेमी

पुलिया का पागल चौकीदार कहानी एक सच्चे प्रेमी की जिसकी कहानी को गढ़ा जमानो पूर्व साहित्यकार सुदामा प्रसाद प्रेमी जी ने यू तो गढ़वाली साहित्य में भी कही बेहतरीन से बेहतरीन कहानियां गढ़ी सुदामा प्रसाद प्रेमी जी ने जैसे गायत्री की ब्वे पर हिंदी कथा साहित्य में भी उनकी कहानियां उतनी दमदार है उनकी कहानियों में भी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जैसा स्तर और समाज का यथार्थ है , कितनी बारीकी से पुलिया का पागल चौकीदार की कहानी गढ़ी है जो जमानो पूर्व उत्तराखंड समाज की एक पत्रिका गढ़ सुधा में भी छपी थी जो पंजाब चंडीगढ़ से निकलती थी , सम्पादक कथा प्रेषित का पता 3/350, खिचड़ीपुर दिल्ली है सुदामा प्रसाद प्रेमी जी का यह कहानी अन्या किस किस जगह छपी किस कहानी संग्रह में है या नही यह तो नही पता किंतु कहानी प्रकाशित है इतना पता है .

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यह कहानी शुरू होती है पुलिया के उस पागल चौकीदार से जिसको दुनिया पागल कहती है पर उस पागल से आने जाने राहगीरों को कोई दिक्कत नही है उसको सभी ठीक समझते है लोग दया का भाव रखते है जब कहानीकार उस पुलिया से जाते तो वो उस पागल की बात सुनते मैं पुलिया को खंडहर नही होने दूंगा मैं इस पुलिया का चौकीदार हु , इस पुलिया राहगीर उसके लिए कहानियों के पात्र है पुलिया से बहता गंगा नाला उसके लिए गंगा की गंगोत्री से भी पावन उसके लिए वो पुलिया सुर लय ताल से सजी कविता गीत या कोई सरगम है उसकी बातों को सुन दुनिया को आनन्द आता था , उसकी बातोंको सुन कथाकार सुदामा प्रसाद प्रेमी जी ने कहा लगता तुम कोई साहित्यकार , संगीतकार , चित्रकार हो जो पुलिया में बैठ साधना कर रहे हो पागल हँसा उसने कहा आप मेरी कहानी को सुनना समझना चाह रहे मुझे तो आप ही कोई कहानीकार लगते हो उस पागल की बात सुन सुदामा प्रसाद प्रेमी जी ने कहा मैं कहानी लिखने का शौक रखता हूँ पर मैं कोई कहानी कार यह नही कह सकता इसी कड़ी में पागल और सुदामा प्रसाद प्रेमी जी का संवाद होता है कहानी फ़्लैश बैक में जाती है किस तरह वो पुलिया पागल चौकीदार बना है , प्रेम घृणा कुरीति समाजिक बन्धनों में कटाक्ष करती यह कहानी को बहुत मार्मिक तरह से लिखा गया है किस तरह बेजोड़ कथा शिल्प था.

सुदामा प्रसाद प्रेमी जी मे कथा से वो इस तरह जुड़े वोभी कथा के एक पात्र बन गए कहानी में कहानी सुनाते सुनाते पागल पुलिया चौकीदार गहरी निंद्रा में चल जाता है कथाकार के आवाज देने के बाद भी वो नही उठता है पुलिया में उसकी तैरती लाश को देखकर आते जाते राहगीर उसको देख कहते कितना अच्छा था बेचारा किसी को तंग भी नही करता था , कहानी के आखिरी दृश्य में हाथ रेडियो ट्रांजिस्टर लिए पुलिया से गुजर रहा है और उसमें गीत बज रहा है *हम तुम्हे चाहते है ऐसे मरने वाला जिंदगी चाहता हो जैसे *, कथाकार के मुँह अनायास दुखी मन से शब्द निकल पढ़ते है कितना विरोधाभास है यही पर कहानी खत्म होती है जिस दिन कथाकार सुदामा प्रसाद प्रेमी ने पुलिया पागल चौकीदार कहानी गढ़ी उस दिन खाना नही खाया अपनी धर्मपत्नी और परिवार से बात नही की , इस गहरी संवेदना के साथ गढी कहानी में कथा का कितना बेजोड़ शिल्प है नमन ऐसे साहित्यकार और कथाकार जिसको दुनिया सुदामा प्रसाद प्रेमी कहती है !

– शैलेन्द्र जोशी – श्रीनगर

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