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राम मंदिर-बाबरी मस्जिद केस की आज होगी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गयी थी याचिका

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भारत में राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है, जिसकी बदौलत काफ़ी समय से राजनीतिक माहौल गर्म है। सरकारों को राम मंदिर का काफ़ी फ़ायदा भी हुआ है तो वहीं इसकी वजह से कई सरकारें भी गिरी हैं। हिंदुओं की राम मंदिर से आस्था जुड़ी हुई है तो वहीं मुस्लिम समुदाय के लोगों की बाबरी मस्जिद से आस्था जुड़ी हुई है। दोनों चाहते हैं कि उनके साथ इंसाफ हो। इसी वजह से विवादित राम जन्मभूमि का केस कोर्ट में है। बता दें देशभर में राम मंदिर निर्माण के ऊपर चल रही बहस के बीच आज सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर अहम सुनवाई करने वाली है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गयी थी याचिका:

राम मंदिर

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर अब फ़ाइनल काउंटडाउन शुरू हो रहा है। इसपर पूरे देश की नज़र टिकी हुई है। आज से शुरू होने वाली सुनवाई विवादत भूमि को तीन भागों में बाँटने वाले 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गयी याचिका के ऊपर है। बता दें मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई सहित जस्टिस संजय किशन क़ौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ़ की पीठ इस मामले में दायर की गयी याचिका पर सुनवाई करेगी। वरिष्ठ वक़ील ज़फ़रयाब के अनुसार, आज सुप्रीम कोर्ट ये तय करेगा कि अयोध्या केस की सुनवाई करने वाली बेंचों में कौन होगा और क्या यही बेंच सुनवाई करेगी।

तीनों पक्षों में बाँट दिया जाए बराबर-बराबर:

इसके अलावा यह सुनवाई किस तारीख़ को की जाएगी, इसका निर्धारण भी आज ही किया जाएगा। इससे पहले 27 सितम्बर 2018 को कोर्ट ने मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग है या नहीं वाले फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि, अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दीवानी वाद का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और उर्व का फ़ैसला इस मामले में प्रासंगिक नहीं है। हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितम्बर 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फ़ैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ ज़मीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वफ़्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बाँट दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने लगा दिया था इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक:

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इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं माना और यह विवाद जस का तस बना रहा। अगर उस समय तीनों पक्षों ने कोर्ट के फ़ैसले को मान लिया होता तो राम जन्मभूमि का मामला कब का ही निपट गया होता। कोर्ट का फ़ैसला ना मानने के बाद उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले पर रोक लगा दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में यह केस पिछले 8 सालों से चल रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर निर्माण को लेकर एक बार फिर से देश में उफान देखा जा रहा है।

राम मंदिर के इर्द-गिर्द घूमती है भाजपा की राजनीति:

ऐसे में आज सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालाँकि इस मामले में कोर्ट का फ़ैसला कब तक आ पाएगा, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन राम मंदिर निर्माण के पक्षकारों और इसका समर्थन करने वाले दलों ने सवाल तेज़ कर दिए हैं। भाजपा नेता इस मामले में जल्दी सुनवाई की बात कर रहे हैं। वहीं राम मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस हमेशा शांत रही है। कांग्रेस राम मंदिर निर्माण नहीं चाहती है। जबकि भाजपा की पूरी राजनीति हाई राम मंदिर के इर्द-गिर्द घूमती है।


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