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आज से 25 साल पहले अयोध्या पर अध्यादेश लाई थी कांग्रेस, तब भाजपा ने किया था विरोध

अधिनियम से साफ़ नहीं हो पाया राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़

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राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही गर्म मुद्दा रहा है। अब क़ानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करने की माँग ज़ोर पकड़ रही है। मोदी सरकार ने अभी तक इसपर कोई फ़ैसला नहीं लिया है। वहीं कांग्रेस कह रही है कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए। बता दें आज से 25 साल पहले कांग्रेस सरकार ने अयोध्या मसले पर अध्यादेश लायी थी, जिसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया था। उस समय भाजपा ने उसका विरोध किया था। विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में भाजपा के समर्थन से चल रहे राम मंदिर आंदोलन के परिणामस्वरूप 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी थी।

साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारे को बनाए रखना है ज़रूरी:

अयोध्या

इसके एक साल बाद 1993 में यह अध्यदेश सरकार द्वारा लाया गया था। उस समय के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इसे मंज़ूरी दी थी। इसके तहत विवादित परिसर की कुछ ज़मीन का सरकार की तरफ़ से अधिग्रहण किया जाना था। राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिलने के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंज़ूरी के लिए लोकसभा में रखा। जब यह बिल पास हो गया तो इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया। बिल पेश करते समय तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण ने कहा था, देश के लोगों में साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना को बनाये रखना ज़रूरी है।

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अधिनियम से साफ़ नहीं हो पाया राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़:

ठीक यही तर्क भाजपा और आरएसएस की नेता भी दे रहे हैं। अयोध्या अधिनियम विवादित ढाँचे और इसके पास की ज़मीन को अधिग्रहीत करने के लिए लाया गया था। नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ़ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की थी। इसे लेकर कांग्रेस सरकार की योजना अयोध्या में एक राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूज़ियम और अन्य सुविधाओं के निर्माण की थी। हालाँकि अयोध्या अधिनियम से राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं हो पाया। भाजपा ने नरसिम्हा राव के इस क़दम का जमकर विरोध किया था। भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस क़ानून को पक्षपातपूर्ण तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुयी ख़ारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने लगा दिया था क़ानून पर स्टे:

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भाजपा के साथ मुस्लिम संगठनों ने इस क़ानून का विरोध किया था। बता दें नरसिम्हा राव ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से भी इस मसले पर सलाह माँगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या, राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के विवादित जगह पर कोई हिंदू मंदिर या कोई हिंदू ढाँचा था। 5 जजों की खंडपीठ ने इन सवालों पर विचार किया था, लीकिं कोई जवाब नहीं दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट की व्याख्या की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर विवादित जगह के जमीन संबंधी मालिकाना हक (टाइटल सूट) से संबधित कानून पर स्टे लगा दिया था।


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