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शहीद-ए-आज़म जयंती: दिल्ली से सटे हुए इसी शहर में बम बनाते थे भगत सिंह

आज़ादी की लड़ाई के लिए देते थे आश्रम में प्रशिक्षण

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भारत में जब आज़ादी की लड़ाई चल रही थी, उस समय वीर सपूतों की कमी नहीं थी, जो हँसते-हँसते अपने देश के लिए जान लूटा दें। उन्ही में से एक वीर थे शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, जिनकी आज 28 सितम्बर को जयंती है। भगत सिंह को अपनी सगी माँ से ज़्यादा प्यारी भारत माँ थी। भगत सिंह 23 मार्च 1931 को जब केवल 23 साल के थे, तभी उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल में राजगुरु और सुखदेव के साथ शाम के 7:33 बजे फाँसी पर लटका दिया गया था। अंग्रेज़ों को लगा कि भगत सिंह की मौत से लोग सहम जाएँगे, लेकिन लोगों के अंदर ग़ुस्सा फूटा जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत को जड़ से हिला दिया।

 

अंग्रेज़ों का पहुँचना था मुश्किल:

बहुत कम लोग यह जानते हैं कि देश की आज़ादी के लिए हँसते-हँसते अपने जान की क़ुर्बानी देनी वाले इन वीर सपूतों ने दिल्ली से सटे हुए नोएडा के नलगढ़ गाँव को अपना ठिकाना बनाया था। इसमें से सरदार भगत सिंह भी थे। दिल्ली से नज़दीक होने की वजह से इस गाँव में बना हुआ विजय सिंह पथिक आश्रम आज़ादी के मतवालों के लिए सबसे महफ़ूज़ जगह बन गया था। जब-जब क्रांतिकारी अंग्रेज़ी सेना पर हमला करते थे, तो वहाँ से भागकर यहीं छुपते थे। बीहड़ क्षेत्र होने की वजह से अंग्रेज़ी सेना का यहाँ पहुँचना सम्भव नहीं था। इसी आश्रम में शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद बम भी बनाते थे।

 

आज़ादी की लड़ाई के लिए देते थे आश्रम में प्रशिक्षण:

गाँव में आज भी कई बिखरी निशानियाँ इस बात की गवाही देती हैं। असेंबली पर फेंका हुआ बम भी इसी गाँव में बनाया गया था। नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे के किनारे बसा हुआ नलगढ़ गाँव पहले हरनंदी (हिंडन) और यमुना के बीच में पड़ता था। दोनों नदियों के बाँध बन जानें की वजह से अब यहाँ पहुँचना आसान हो गया है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। पहले नदी के पानी और घने जंगलों के बीच से होकर इस गाँव में पहुँचना होता था। पेड़ों से घिरा होनें की वजह से इस गाँव की पहचान करना भी आसान नहीं था। यहाँ शहीद विजय सिंह पथिक का बड़ा सा आश्रम भी था। वह गाँव में नौजवानों को आज़ादी की लड़ाई के लिए आश्रम में प्रशिक्षण देते थे। इस श्रम के देश के अन्य क्रांतिकारियों ने भी फ़ायदा उठाया।

 

यही बनाते थे आंदोलन को सही दिशा देने की योजना:

देश के महान क्रांतिकारियों में गिने जानें वाले चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह ने भी यहीं पर पनाह ली थी। एक तरफ़ गांधी जी अंग्रेज़ों से इस देश को मुक्त करवाने के लिए अहिंसा के रास्ते पर चल रहे थे और अंग्रेज़ों की मुश्किलें बढ़ा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ़ भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी सेनाओं पर लगातार हमला करके उनकी हालत ख़राब कर दी थी। अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने साथियों के साथ दिल्ली से नज़दीक होने की वजह से नलगढ़ को ही अपना ठिकाना चुना था। वहाँ वो लोग तीन साल तक छुपकर रहे थे। इस दौरान अंग्रेज़ी हुकूमत पर हमले करने की रणनीति और आंदोलन को सही रास्ता देने के लिए योजना बनाते थे।

 

घोड़ों पर सवार होकर पहुँचते थे मंज़िल तक:

ग्रामीणों का कहना है कि क्रांतिकारियों को अंग्रेज़ों से छुपकर किसी ऐसी जगह की तलाश थी, जहाँ वो अपने आंदोलन को बड़ी आसानी से शुरू रख सकें। भगत सिंह ने इसके लिए बागपत के नवाब के वक़ील बाबू बृज बिहारी लाल से इस तरह की जगह के बारे में जानकारी ली थी। उन्होंने भगत सिंह को विजय सिंह पथिक आश्रम में रहने का सुझाव दिया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद सहित उनके अन्य साथियों ने इसी जगह को अपना ठिकाना बनाया। स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र विकल और पंडित कालीचरण उनके लिए गाँवों से खाना लाते थे। विजय सिंह पथिक के पास कई अच्छी नस्ल के घोड़े भी थे। क्रांतिकारी इन्ही घोड़ों पर सवार होकर अपनी मंज़िल तक पहुँचते थे।

 

आज भी गाँव में मौजूद है बम बनाने वाला पत्थर:

इसी गाँव में बारूद से बम भी बनाए जाते थे। ट्रेन में सफ़र कर रहे अंग्रेज़ वायसराय को मारने की योजना भी नलगढ़ गाँव के जंगलों में ही बनी थी। लेकिन जब हमला हुआ तो वह दूसरी बोगी में होने की वजह से बच गया। इस घटना के बाद अंग्रेज़ों को स्वतंत्रता सेनानियों के नलगढ़ गाँव में छुपे होने की सूचना मिली। इसके बाद नलगढ़ गाँव की घेराबंदी कर ली गयी और क्रांतिकारियों को पकड़ने का प्रयास किया गया। अंग्रेज़ी सेना देखती रह गई और क्रांतिकारी चकमा देकर भाग निकले। बम बनाने के लिए बारूद और अन्य चीज़ों को जिस पत्थर पर रखा जाता था, वो पत्थर आज भी नलगढ़ गाँव में मौजूद है। पत्थर में दो गड्ढे हैं, जिसमें बारूद मिलाया जाता था।

 

28 सितम्बर 1907 को पाकिस्तान में हुआ था जन्म:

इतिहासकार डॉक्टर रामदेव पी कथुरिया के अनुसार दिल्ली से सटे होने की वजह से ही नलगढ़ क्रांतिकारियों का गढ़ बना हुआ था। घने जंगलों और हरनंदी एवं यमुना नदी होने की वजह से सभी के लिए यहाँ पहुँचना आसान नहीं था। इसी का फ़ायदा क्रांतिकारियों को मिला। जानकारी के लिए बता दें शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को लायलपुर ज़िला (फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान) के बंगा गाँव में हुआ था। इनके पूर्वजों का जन्म पंजाब में नवांशहर के नज़दीक खटकड़कलां गाँव में हुआ था। बचपन से ही भगत सिंह देश के लिए कुछ करना चाहते थे। जैसे ही थोड़े बड़े हुए ये आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े।

 

12 सितम्बर 1929 से शुरू करके आख़िरी दिन तक लिखते रहे डायरी:

लाहौर जेल में रहते हुए शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने 12 सितम्बर 1929 से एक डायरी लिखनी शुरू की थी और शहादत से अंतिम दिन से पहले 22 मार्च 1931 तक डायरी लिखी थी। अंग्रेज़ी और उर्दू में लिखी गई भगत सिंह की मूल डायरी उनके प्रपौत्र यादविंदर सिंह संधू के पास अमूल्य धरोहर की रूप में सुरक्षित है। पिछले साल उन्होंने इस डायरी के पन्नों की स्कैन प्रतियों के साथ-साथ अंग्रेज़ी में अनुवाद भी करवाया था। इसके बाद इसे रिलीज़ कराया था। भगत सिंह के जन्म को इतिहास में गौरवमयी दिन के रूप में याद किया जाता है। अविभाजित भारत की इस भूमि पर एक ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ जो इतिहास लिखने के लिए ही पैदा हुआ था।

 

भगत सिंह ने हिला दी थी अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव:

भगत सिंह का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था। जब उन्हें यह समझ में आया कि उनकी आज़ादी घर की चारदीवारी तक ही सीमित है तो उन्हे बहुत दुःख हुआ। वो बचपन से ही कहते थे कि अंग्रेज़ों से आज़ाद होने के लिए याचना की जगह रण करना होगा। भगत सिंह की सोच उस समय पूरी तरह बदल गयी, जिस समय जलियाँवाला बाग़ कांड (13 अप्रैल 1919) हुआ था। जानकारी के अनुसार उस क़त्ले-आम से भगत सिंह इतने दुखी हुए थे कि पीड़ितों का दर्द बाँटने के लिए 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला पहुँचे थे। भगत सिंह ने बाद में ऐसे-ऐसे काम किए, जिससे अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिल गयी। अंग्रेज़ इन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहते थे। सांडर्स हत्याकांड में उन्हें मौक़ा मिल गया और भगत सिंह एवं उनके साथियों पर मुक़दमा चलाकर अंग्रेज़ों ने इन्हें फाँसी की सज़ा दे दी।


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