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संभावनाओं की तलाश में इस देश का युवा वर्ग, जानिये क्या हैं मुश्किलें

कुछ तो ट्रेनों में भेङ- बकरियों की भांति सफर करने को मजबूर

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कभीं- कभी हम सोचते है कि जीवन में आखों के सामनें से गुज़री कुछ अभ्दुत कहानियां क्यां है? छोटे गावों से बङे शहरों में हर दिन Unemployment- youth struggling for job in indiaबङी संख्यां में  भारतीय युवा पहुंच रहे है। यह उर्जा भारत को बना भी सकती है तो व्यर्थ गई तो बिगाङ भी सकती है। सवाल यह है कि क्यां एक देश और समाज के नाते हम अपने उन युवाओं को, जिनमें कुछ करने का जज्बा तो है,लेकिन अवसर नहीं। देखा जाये तो देश के नीतियों का अगला प्रमुख मुद्दा यहीं होना चाहिए। और इसके लिए कुछ बेहतर करने की जरुरतों पर पुरा फोकस होना चाहिए।

5000 लोग अपने भविष्य की तलाश में रोजाना पहुंचते है।

धूल- धूसरित बालों वाला एक लङका अपने गांव से कुछ किलोमीटर का सफर तय कर बस में सवार होता है। जो उसे निकटतम रेलवे स्टेशन तक ले जाएगी। वहां से एक सुदूर शहर का सफर वह रेलगाङी से तय करता है। अपने दिलों- दिमाग में सुनहरे सपने और कंधो पर पीछे छोङ आए परिवार की जिम्मेदारी लिए वह नये शहर से संपर्क साधता है। हर दिन देश में यह कहानी खुद को दोहराती है। अकेले मुम्बई और दिल्ली में करीब 5000 लोग अपने भविष्य की तलाश में रोजाना पहुंचते है। ऐसो की खोज में आपको दूर तक देखने की जरुरत नहीं हैं। जैसे आपके अपार्टमेंट के बाहर खङे गार्ड या काम पर जा रही नौकरानी या फल वाला। ये हमारी आबादी में बहुसंख्यक है। हम उनके बारे में बेहद कम जानते- सुनते है। लेकिन उनमें से हर कोई उस गाते का हिस्सा है जो भविष्य की ओर अग्रसर है और हम जैसों को भी आगे ले जा रहीं है।

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सपने देखने वाली, इनकी आंखे भी पथरा गई है

अगर हम देशहित की बात कर रहे तो समझ लिजिये हम अपने युवाशक्ति की बात कर- रहे है। एक युवा आबादी और उनकी आकांक्षाए शहर बना भी सकते है या उसके विनाश का कारण भी बन सकते है। इन नौजवानों में उर्जा और संभावनाओं का जो संचार है, उसका सही इस्तेमाल न करना ही सबसे बङी त्रासदी है। देश आज़ादी के 71 साल बाद भी अपने युवा वर्ग को नहीं पहचान पाया और उनका सही ढंग से इस्तेमाल भी नहीं किया। इन्हें शहरों में जो काम मिलता है वो अस्थायी और गैर- भरोसेमंद होते है। उनके पास रहने के लिए ठीक-ठाक घर नहीं होता, पेयजल और बिजली की आपूर्ति नहीं होती। ऐसी समस्याएं कुछ कहती है।


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