THE ADDA
THE ADDA: Hindi News, Latest News, Breaking News in Hindi, Viral Stories, Indian Political News

आख़िर क्या है यह राफ़ेल सौदा और क्यों इसको लेकर गर्म है राजनीतिक गलियारे का माहौल? जानें

126 विमानों की ख़रीद को दी गयी 2007 में मंज़ूरी

4,786

राफ़ेल सौदे को लेकर आए दिन मीडिया में कोई ना कोई ख़बर आती रहती है। राफ़ेल सौदे की वजह से मोदी सरकार की जमकर किरकिरी भी हो रही है। कांग्रेस लगातार मोदी सरकार पर राफ़ेल सौदे को लेकर हमला बोले हुए है। राफ़ेल सौदे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो पीएम मोदी को अप्रत्यक्ष रूप से चोर भी बोल दिया है। आख़िर ये राफ़ेल सौदा क्या है और इसको लेकर इतना बवाल क्यों मचा हुआ है। आज हम आपको राफ़ेल सौदे के बारे में सबकुछ बताने जा रहे हैं।

 

126 विमानों की ख़रीद को दी गयी 2007 में मंज़ूरी:

दरअसल वायुसेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कम से कम 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की ज़रूरत थी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी क्षमता घटकर केवल 34 स्क्वाड्रन रह गई। इसको ध्यान में रखकर 126 लड़ाकू विमान ख़रीदने का सबसे पहले प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने रखा था। लेकिन इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया कांग्रेस की सरकार ने। रक्षा ख़रीद परिषद, जिसके उस समय मुखिया एके एंटनी थे, ने 126 विमानों की ख़रीद को अगस्त 2007 में मंज़ूरी दी थी। इसके बाद शुरू हुई बोली लगाने की प्रक्रिया। अंत में 126 विमानों की ख़रीद का आरएफ़पी जारी किया गया। राफ़ेल लड़ाकू विमानों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये 3800 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है।

 

राफ़ेल की क़ीमत अन्य विमानों की तुलना में थी बहुत कम:

आपकी जानकारी के लिए बता दें यह डील उस मिडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ़्ट (एमएमआरसीए) कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से इंडियन एयरफ़ोर्स (IAF) लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ़्ट और सूखोइ के बीच अंतर को ख़त्म करने के मक़सद से शुरू किया गया था। एमएमआरसीए के कॉम्पटिशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे। इन सभी छः फ़ाइटर जेट के बीच राफ़ेल लड़ाकू विमान को इसलिए चुना गया, क्योंकि इसकी क़ीमत अन्य विमानों की तुलना में बहुत कम थी। इसके साथ ही इसका रख-रखाव भी बहुत सस्ता था।

 

कांग्रेस सरकार में रह गयी राफ़ेल डील अधूरी:

इसके बाद भारतीय वायुसेना ने कई विमानों का तकनीकी परीक्षण और मूल्याँकन किया और 2011 में यह घोषणा की कि राफ़ेल और यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून उसके मापदंडों पर खरे उतरे हैं। 2012 में राफ़ेल को एल-1 बिडर घोषित किया गया और इसके निर्माता दसॉ एविएशन के साथ समझौते पर बातचीत शुरू हुई। लेकिन आरएफ़पी अनुपालन और लागत सम्बंधी कई मामलों की वजह से 2014 तक यह बातचीत अधूरी ही रही। 2014 मई में यूपीए सरकार बदल गयी और सत्ता में आयी भाजपा की मोदी सरकार।

 

2014 में फिर से शुरू हो गया इस दिशा में प्रयास:

यूपीए सरकार के दौरान इसपर समझौता नहीं हो पाया, क्योंकि ख़ासकर तकनीकी ट्रांसफ़र के मामले में दोनो पक्षों में गतिरोध बन गया था। दसॉ एविएशन ने भारत में बनने वाले 108 विमानों की गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं थी। उस समय दसॉ का कहना था कि भारत में विमानों के उत्पादन के लिए 3 करोड़ मानव घंटों की ज़रूरत पड़ेगी, लेकिन एचएएल ने इससे तीन गुना ज़्यादा मानव घंटों की ज़रूरत बताई। इसकी वजह से लागत कई गुना और बढ़ जानी थी। जब केंद्र में मोदी की सरकार 2014 में आयी तो एक बार फिर से इस दिशा में प्रयास शुरू हो गया।

 

हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना के मानकों के अनुरूप होनी है:

पीएम मोदी की फ़्रांस यात्रा के दौरान 2015 में भारत और फ़्रांस के बीच इस विमान की ख़रीद को लेकर समझौता किया गया। इस समझौते में भारत ने जल्द से जल्द 36 राफ़ेल लड़ाकू विमान उड़ान की अवस्था में तैयार विमान हासिल करने की बात कही। समझौते के अनुसार दोनों देश विमानों की आपूर्ति की शर्तों के लिए एक अंतर-सरकारी समझौता करने को सहमत हुए। उस समझौते के अनुसार विमानों की आपूर्ति भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों के अनुसार उसके द्वारा तय समय सीमा के अंदर होनी थी और विमान के साथ जुड़े सभी सिस्टम और हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना द्वारा तय मानकों के अनुरूप होनी है।

 

नहीं किया गया सौदे का पूरा विवरण सार्वजनिक:

इस समझौते में कहा गया कि लम्बे समय तक विमानों के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी फ़्रांस की होगी। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंज़ूरी मिलने के बाद दोनो देशों के बीच 2016 में समझौता हुआ। समझौते पर दस्तखत होने के लगभग 18 महीने के अंदर ही विमानों की आपूर्ति करने की बात थी, यानी 18 महीने के बाद भारत को फ़्रांस की तरफ़ से पहला राफ़ेल लड़ाकू विमान दिया जाना था, लेकिन समय सीमा पार होने के बाद भी भारत में राफ़ेल विमान नहीं आया। इसके बाद एनडीए सरकार अपनी तुलना यूपीए सरकार से करने लगी और कहा कि उसने पिछली सरकार से बेहतर सौदा किया है और लगभग 12600 करोड़ रुपए बचाए हैं। लेकिन 36 विमानों के लिए हुए सौदे का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया।

 

नहीं हुई थी तकनीकी ट्रांसफ़र की कोई बात:

सरकार का दावा है कि पहले भी तकनीकी ट्रांसफ़र की कोई बात नहीं हुई थी। केवल निर्माण तकनीक के लाइसेंस देने की बात थी। लेकिन मौजूदा समझौते में मेक इन इंडिया पहल किया गया है। फ़्रांसीसी कम्पनी भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगी। लेकिन मीडिया में आयी कई ख़बरों में यह दावा किया जा रहा है कि यह पूरा सौदा 7.8 अरब रुपए यानी 58000 करोड़ रुपए में किया गया है और इसका 15 प्रतिशत एडवांस में दिया जा रहा है। भारत को इसके साथ स्पेयर पार्ट्स और मेटोर मिसाइल जैसे हथियार भी मिलेंगे। इन हथियारों को काफ़ी उन्नत माना जाता है। बताया जाता है कि ये मिसाइल 100 किलोमीटर दूर स्थित दुश्मन के विमान को भी मार गिरा सकती है।

 

नहीं है इस सौदे में मेक इन इंडिया का कोई प्रावधान:

जानकारी के अनुसार अभी भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान के पास इतना उन्नत विमान सिस्टम नहीं है। राफ़ेल सौदे पर विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर सरकार ने हज़ारों करोड़ रुपए बचा लिए हैं तो उसे आँकड़ों को सार्वजनिक करने में क्या दिक़्क़त है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यूपीए सरकार ने 126 विमानों के लिए 54000 करोड़ रुपए दे रही थी, जबकि मोदी सरकार सिर्फ़ 36 विमानों के लिए 58000 करोड़ दे रही है। कांग्रेस का आरोप है कि एक प्लेन की क़ीमत 1555 करोड़ रुपए है। जबकि कांग्रेस उस समय एक विमान 428 करोड़ रुपए में ख़रीद रही थी। कांग्रेस सरकार का कहना है कि भाजपा सरकार इस सौदे में मेक इन इंडिया का कोई प्रावधान नहीं है।

 

यह सौदा करने की क्यों थी इतनी हड़बड़ी:

विपक्ष का कहना है कि यूपीए सरकार 18 बिलकुल तैयार राफ़ेल लड़ाकू विमान ख़रीदने वाली थी और बाक़ी के 108 विमान भारत में एसेंबलिंग होने वाले थे। इसके साथ ही इस सौदे में ट्रांसफ़र ऑफ़ टेक्नोलॉजी की बात कही गयी थी। ताकि बाद में भारत में इन विमानों को ख़ुद से ही बनाया जा सके। कांग्रेस का कहना है कि जब यूपीए सरकार सस्ते, बेहतर और व्यापक सौदे पर बात कर रही थी तो इस सौदे को करने की एनडीए सरकार को इतनी बड़ी हड़बड़ी क्यों थी। इस सौदे के आलोचकों का कहना है कि यूपीए के सौदे में विमानों के भारत में एसेंबलिंग में सार्वजनिक कम्पनी हिंदुस्तान एयरक्राफ़्ट लिमिटेड को शामिल करने की बात की थी। बता दें भारत में एक यही कम्पनी है जो सैन्य विमान बनाती है।

 

भाजपा को नुक़सान पहुँचा सकता हाउ राफ़ेल सौदा:

एनडीए सरकार ने इस सौदे से एचएएल को बाहर करके यह काम अनिल अम्बानी की रिलायंस को दे दिया। कांग्रेस का आरोप है कि सौदे से एचएएल को 25000 करोड़ रुपए का घाटा होगा। बता दें राफ़ेल विमान सौदे के बवाल के बीच में ही फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद भारत की राजनीति और गरमा गयी है। हर जगह इस समय राफ़ेल सौदे की ही चर्चा हो रही है। कांग्रेस इस सौदे को लेकर भाजपा के ऊपर लगातार हमला बोले हुए है। अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और राफ़ेल सौदा भाजपा के लिए बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा सकता है। जानकारों का कहना है कि राफ़ेल सौदे की वजह से भाजपा की आने वाले चुनाव में स्थिति ख़राब हो सकती है।

 



और पढ़ें:-

Comments
Loading...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More