THE ADDA
THE ADDA: Hindi News, Latest News, Breaking News in Hindi, Viral Stories, Indian Political News

आख़िर क्यों कुछ नहीं कर रही दिल्ली-एनसीआर में फैलने वाले ज़हर को रोकने के लिए मोदी सरकार

भारत में काफ़ी समय से जलाई जा रही है पराली

0 4,672
SHEIN -Your Online Fashion Jumpsuit

आज के समय में पूरे विश्व में सबसे बड़ा मुद्दा बढ़ते प्रदूषण का है। जैसे-जैसे समाजआधुनिक और तकनीकी का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे प्रदूषण भी अपने पैर पसारते जा रहा है। अगर भारत की बात करें तो भारत के कई शहरों की हालत प्रदूषण के मामले में बहुत ही ख़राब है। भारत की राजधानी दिल्ली की स्थिति पूरी दुनिया की राजधानियों में सबसे बुरी मानी जाती है। दिल्ली-एनसीआर की हालत हमेशा से ही ख़राब रहती है। हर साल दिवाली के बाद दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। इस बार भी ऐसा ही होगा। यहाँ प्रदूषण का हवाई हमला शुरू हो चुका है।

क्या इस बार सरकार उठाएगी कोई ठोस क़दम:

दिल्ली

राजधानी से सटे हुए पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ख़रीफ़ के फ़सल की कटाई शुरू हो गयी है और किसानों ने अगली फ़सल की तैयारी के लिए एक बार फिर से पराली (पुआल) जलाना शुरू कर दिया है। उससे उठने वाले धुएँ अगले कुछ ही दिनों में दिल्ली और उससे सटे हुए इलाक़े में दस्तक दे देंगे और लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा।

लोगों को साँस लेने में काफ़ी तकलीफ़ होती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार इस बार भी पिछली बार की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी या दिल्ली के ऊपर मँडराने वाले इस ख़तरे से निपटने के लिए कुछ क़दम भी उठाएगी?

नहीं बचाया जा सकता प्रदूषण के प्रकोप से:

आपको याद होगा 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की समस्या को ध्यान में रखते हुए दिवाली पर दिल्ली में पटाखों पर बैन लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि दिल्ली में दिवाली के समय पटाखों की वजह से वातावरण बुरी तरह से प्रदूषित हो जाता है। इसका ख़ामियाज़ा पड़ोसी राज्यों सहित दिल्ली की करोड़ों की आबादी को भुगतना पड़ता है। 2017 में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंध था, इस वजह से ज़्यादा मात्रा में पटाखे नहीं फोड़े गए, लेकिन इसके बाद भी दिल्ली और इसके आस-पास के राज्यों में प्रदूषण का स्तर वैसे का वैसा ही रहा। इन्हें प्रदूषण के प्रकोप से नहीं बचाया जा सका।

रहता है लोगों को कई बीमारियों का ख़तरा:

why modi government not taking initiative for pollution control

आपकी जानकारी के लिए बता दें पटाखों पर प्रतिबंध इसलिए लगाया गया था, ताकि यह पता चल सके कि पटाखों की वजह से कितना प्रदूषण वातावरण में मिल रहा है। सर्वे में हैरान करने वाली बात सामने आयी कि उत्तर भारत के प्रदूषण की असली वजह दिल्ली में जलाए जानें वाले पटाखे नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेतों में जलाई जानें वाली पराली है।

इसकी वजह से पटाखों से कई गुना प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर की हवा में घुल जाता है। दिवाली के आस-पास दिल्ली-एनसीआर की स्थिति इतनी बुरी हो जाती है कि यहाँ साँस लेना दुभर हो जाता है। इसकी वजह से यहाँ के लोगों को कई तरह की बीमारियों का भी ख़तरा रहता है।

काफ़ी समय से जलाई जा रही है भारत में पराली:

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) के एक दशक पहले दिए आंकड़ों के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली का वातावरण पराली जलाने से लगभग 150 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड, 9 मिलियन टन कार्बन मोनोऑक्साइड व 0.25 मिलियन टन बेहद जहरीली ऑक्साइड ऑफ सल्फर से भर जाती है। IARI का दावा है कि दिल्ली में प्रदूषण के अन्य स्रोत जैसे गाड़ियां, फैक्ट्रियां और कूड़ा जलाने से लगभग 17 गुना अधिक प्रदूषण महज अक्टूबर-नवंबर के दौरान उत्तर भारत में पराली जलाने से होता है। पराली जलाने से कॉर्बन डाइऑक्साइड का संचार अन्य प्रदूषण स्रोतों से लगभग 64 गुना अधिक होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें भारत में पराली जलाने की परम्परा नई नहीं है बल्कि यह काफ़ी समय से की जा रही है।

ख़रीफ़ की फ़सल के बाद जलाई जाती है पराली:

दिल्ली

SHEIN -Your Online Fashion Blouse

- Advertisement -

एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा 2014 में एकत्र किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 के दौरान देश में फसल की कटाई के बाद लगभग 620 मिलियन टन पराली खेतों में बची। इसमें से लगभग 16 फीसदी पराली को खेतों में जला दिया गया, जिसमें लगभग 60 फीसदी पराली धान की थी और महज 22 फीसदी पराली गेहूं की थी।

कृषि विभाग के अनुमान के मुताबिक अकेले पंजाब में 20 मिलियन टन धान और 20 मिलियन टन गेहूं की पराली खेतों में बच रही है। गौरतलब है कि किसानों द्वारा पराली जलाने का काम आमतौर पर खरीफ की फसल के बाद किया जाता है, क्योंकि रबी फसल में निकलने वाली पराली से जानवरों के लिए भूसा और चारा तैयार किया जाता है। यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का साधन बनता है।

डाल रहा है फेफड़ों पर बुरा असर:

वहीं खरीफ की फसल तैयार होने के बाद अगली बुआई के लिए उत्तर भारत में किसानों के पास महज 15 से 20 दिन का समय रहता है। जहां एक तरफ इस समय में उसे त्योहार भी मनाना है, उसे अगली बुआई के लिए खेत को तैयार भी करना है। ऐसे में कृषि जानकारों का दावा है कि इन राज्यों में लगभग 80 फीसदी किसान अपने खेत में पड़ी पराली को जला देते हैं। कुछ समय पहले देश के जाने-माने हॉर्ट सर्जन डॉ नरेश त्रेहन ने एक चैनल से बात करते हुए कहा था कि, दिल्ली एनसीआर में होने वाला पॉल्यूशन आदमी के फेफड़ों पर बुरा असर डाल रहा है।

यह स्थापित करने के लिए डॉ त्रेहन ने नई दिल्ली में एक आदमी के फेफड़ों की तुलना हिमाचल प्रदेश में रहने वाले एक अन्य आदमी के फेफड़ों से की थी। डॉ त्रेहन के मुताबिक दिल्ली में जारी प्रदूषण से आदमी के फेफड़ों पर बुरा असर पड़ रहा है और वह अस्थमा समेत कई गंभीर बीमारियों का जनक बन रहा है।

सरकार की स्कीम बंद पड़ी है फ़ाइलों में:

why modi government not taking initiative for pollution control

नीति आयोग ने 2017 में केन्द्र सरकार को प्रदूषण के इस कारण को रोकने के लिए 600 मिलियन डॉलर (3,200 करोड़ रुपये) खर्च करने का सुझाव दिया था। इस सुझाव के बाद केन्द्र सरकार ने प्रति वर्ष 230 मिलियन डॉलर (1,700 करोड़ रुपये) खर्च कर किसानों को पराली जलाने से रोकने का प्रस्ताव तैयार किया।

केन्द्र सरकार के प्रस्ताव के तहत वह दिल्ली से सटे तीन राज्य पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसानों को ऐसी मशीनें खरीदने में मदद करेगी, जिससे किसानों को पराली जलाने से रोका जा सके। इन मशीनों के जरिए किसान आसानी से खेतों में पड़े पराली को एकत्र कर खाद बनाने का काम कर सकते हैं। लेकिन पिछले साल तैयार हुए इस प्लान पर सरकार असमंजस में है और एक बार फिर इन राज्यों में पराली जलाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और सरकार की स्कीम फाइलों में बंद पड़ी है।

खेतों में पराली जलाना है ग़ैरक़ानूनी:

इस योजना के मुताबिक केन्द्र सरकार दो साल में 3,200 करोड़ रुपये खर्च कर पराली की समस्या पर पूरी तरह से काबू पा सकती हैं। गौरतलब है कि खेतों में पराली जलाना गैरकानूनी है और बीते कई वर्षों से राज्य सरकारें इस कानून को प्रभावी करने की कोशिशों में जुटी हैं। इसके बावजूद पराली संकट से साल दर साल राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का स्तर खराब हो रहा है। एक तरफ डॉ नरेश त्रेहन द्वारा की गई शोध इस समस्या का गंभीर असर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रह रहे लोगों पर दिखा रही है।

वहीं केन्द्र सरकार पैसे खर्च कर इस समस्या को हमेशा के लिए काबू करने के मामले में असमंजस में दिख रही है। केन्द्र सरकार के सामने पड़ी एक अन्य रिपोर्ट का दावा है कि पराली जलाने से पंजाब के किसानों को प्रतिवर्ष 800 से 2000 करोड़ रुपये का न्यूट्रीश्नल लॉस और 500 से 1,500 करोड़ रुपये का नुकसान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश फर्टिलाइजर पर खर्च के जरिए हो रहा है।

गहरे होते जा रहे हैं ज़हरीले बदल:

why modi government not taking initiative for pollution control

गौरतलब है कि इस समस्या के प्रभाव क्षेत्र में यदि राज्यों की जनसंख्या को देखें तो उत्तर प्रदेश (20 करोड़), राजस्थान (6.8 करोड़), दिल्ली एनसीआर(5 करोड़), पंजाब (2.8 करोड़) और हरियाणा (2.5 करोड़) में कुल जनसंख्या लगभग 37 करोड़ है। इस जनसंख्या की आधी जनसंख्या पराली से हो रहे प्रदूषण से सीधे प्रभावित होती है। यानी देश की 15-16 करोड़ की जनसंख्या को विषाक्त वायु से बचाने के लिए सरकार को लगभग 3,200 करोड़ रुपये खर्च करना है। प्रति व्यक्ति ये खर्च तकरीबन 200 रुपये प्रतिवर्ष बैठता है। क्या ये कीमत इतनी ज्यादा है कि सरकार आम आदमी को जहरीले धुएं से बचाने के लिए इसे नहीं चुका सकती? ये सवाल दिल्ली-एनसीआर के आसमान में छा रहे जहरीले बादलों की तरह गहरा होता जा रहा है।


Loading...
Loading...

- Advertisement -

SHEIN -Your Online Fashion Blouse

- Advertisement -

Comments
Loading...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More