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मंदिर में शिवलिंग होने के बाद भी नहीं की जाती है पूजा, इस दोष की वजह से होता है ऐसा

पूजा-पाठके बाद भी नहीं मिलता कोई फल

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भारत एक धार्मिक देश है। यहाँ पर केवल हिंदू ही नहीं बल्कि कई अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं। सभी लोग अपनी पसंद और अपने धर्म के हिसाब से ही धार्मिक स्थलों पर जाते हैं। भारत में लाखों धार्मिक स्थल हैं, लेकिन लोग सभी जगहों पर नहीं जाते हैं वो अपनी पसंद के अनुसार ही उस जगह का चुनाव करते हैं। मनुष्य कई बार अपनी परेशानियों से मुक्ति पानें के लिए तो कई बार केवल मानसिक शांति के लिए ही मंदिर जाता है और ईश्वर की पूजा-पाठ करता है।

पूजा-पाठके बाद भी नहीं मिलता कोई फल:

कहा जाता है कि मंदिर में एक अलग तरह की शांति की अनुभूति होती है, जो कहीं और नहीं मिल सकती है। हर व्यक्ति की यही चाहत होती है कि वह भगवान से जो भी माँगे वह पूरा हो जाए। इसी वजह से ज़्यादातर लोग भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं। लेकिन सभी जगहों पर ऐसा नहीं होता है। कई जगहों पर पूजा करने के बाद भी कोई फल नहीं मिलता है। इसी वजह से लोग धीरे-धीरे उस मंदिर में पूजा-पाठ करना ही बंद कर देते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहाँ शीत शिवलिंग की अब पूजा नहीं की जाती है।

शिवलिंग होने के बाद भी क्यों नहीं होती पूजा?

आपकी जानकारी के लिए बता दें हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं, वह देवभूमि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की तहसील में स्थित है। बता दें अब शिव जी के इस मंदिर में पूजा-पाठ नहीं की जाती है। हथिया देवालय के नाम से लोगों के बीच में मशहूर शिवमंदिर में शिवलिंग होने के बाद भी लोग पूजा क्यों नहीं करते हैं, यह बात कुछ हज़म नहीं होती है। इसके पीछे एक वजह है। जिसके बारे में आज हम आपको बताएँगे।

एक ही सवाल का जवाब देते-देते चिढ़ गया था मूर्तिकार:

पौराणिक कथाओं के अनुसार किसी ज़माने में एक मूर्तिकार रहता था, जिसका एक हाथ ख़राब हो गया था। इस वजह से वह अपने एक हाथ से ही मूर्तियाँ बनाया करता था। हर समय सभी लोग उससे बस एक ही सवाल करते थे कि वह एक हाथ से कैसे यह काम करेगा? हालाँकि ज़्यादातर लोग उससे यह सवाल पूछना नहीं चाहते थे, लेकिन उसकी हालत देखकर ना चाहते हुए भी लोग उससे पूछ ही लेते थे। मूर्तिकार को कुछ दिनों के बाद बार-बार एक ही सवाल का जवाब देने से चिढ़ होने लगी। उसे एक ही सवाल का जवाब देना अच्छा नहीं लगता था।

जल्दी-जल्दी निकलने के चक्कर में बना दिया विपरीत दिशा में अरघा:

इन सब बातों से वह इस क़दर तंग हुआ कि उसने एक रात वहाँ से कहीं दूर जानें का मन बना लिया। मूर्तिकार ने अपने औज़ारों को एकत्र किया और उन्हें अपने साथ लेकर वहाँ से जाने लगा। जानें से पहले उसने इसी मंदिर में शिवलिंग का निर्माण किया। सूर्योदय से पहले निकलने के चक्कर में उसने शिवलिंग के अरघे की दिशा बदल दी और वहाँ से चला गया। सुबह जब लोग इस मंदिर में पहुँचे तो यहाँ निर्मित शिवलिंग देखा। सभी लोगों ने देखा कि शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में है यह देखकर वहाँ मौजूद लोग काफ़ी निराश हुए।

विपरीत दिशा में अरघा होना माना जाता है दोष:

इसके बाद वहाँ के लोगों ने उस मूर्तिकार को ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो कहीं नहीं मिला। वह बहुत दूर निकल गया था। शिवलिंग के बारे में शास्त्रों में लिखा गया है कि इस अरघे का विपरीत दिशा में होना एक तरह का दोष होता है। इसी दोष की वजह से ऐसे शिवलिंग की पूजा को शास्त्रों में वर्जित माना गया है। इस शिवलिंग की पूजा करने से व्यक्ति को किसी फल की प्राप्ति भी नहीं होती है। इसी वजह से उस शिवलिंग की बनने के बाद से लेकर आजतक पूजा नहीं की गयी।


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